21 Behtreen Naat Sharif Hindi Mein Likhi Hui
21 बेहतरीन नात शरीफ़ हिन्दी में लिखी हुई
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल
आसमाँ से हबीब उतरा है
रब के घर से क़रीब उतरा है
मुर्दा रूहों को ज़िंदगी देने
ले के नुस्ख़ा अजीब उतरा है
अर्श ने दी सदाए सल्लि अला
जब ख़ुदा का नक़ीब उतरा है
है फ़रिश्तों को हुक्म भेजो दुरूद
देखो ऐसा नजीब उतरा है
ले के कश्कोल आए शाहो-गदा
वो जो बेकस ग़रीब उतरा है
एक-एक लफ़्ज़ है ख़ुदा का कलाम
कैसा यकता ख़तीब उतरा है
जो दुआ की वही क़बूल हुई
ऐसा मुज़्तर मुजीब उतरा है
कौन लेगा तिरा हिसाब वहाँ
जब यहाँ पर हसीब उतरा है
मांद सब पड़ गए सितारे जब
फिर वो माह-ए-मुनीब उतरा है
लफ़्ज़-लफ़्ज़ उसका दिल पे जादू करे
मुनफ़रिद वो अदीब उतरा है
थाम लेता है जो भी हाथ उसका
पार वो ख़ुशनसीब उतरा है
इश्क़ में उसके मैं जो क़ुर्बाँ हूँ
क्यों परेशां रक़ीब उतरा है
हाथ तू भी बढ़ा के नब्ज़ दिखा
तेरा तारिक़ؔ! तबीब उतरा है
डॉ. तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल
मुहम्मद बादशाह-ए-दो-सरा है
मुहम्मद जो हमारा रहनुमा है
मुहम्मद जो हबीब-ए-किब्रिया है
दो आलम के लिए रहमत बना है
ख़िताब उस को दिया सादिक़ सभी ने
अमीं का भी लक़ब उस को मिला है
हुई है दूर ज़ुल्मत उस के दम से
उजाला हर तरफ़ उस से हुआ है
अताए-इल्म-ओ-इरफ़ाँ का समंदर
ख़ुदा के फ़ैज़ का चश्मा बहा है
ख़ुदा के फ़ज़्ल की बरसात बरसी
जो छाई अब्र-ए-रहमत की घटा है
चराग़ उस से हुए दुनिया में रोशन
मह-ओ-अंजुम ने नूर उस से लिया है
किए क़ायम हुक़ूक़ औरत के उस ने
बना बेवाओं के सर पर रिदा है
वो बच्चों के लिए शफ़क़त का पैकर
वो बूढ़ों के लिए भी इक असा है
असीरों की रिहाई का वो मुज़्दा
यतीमों का तो वो मौला रहा है
वो शहज़ादा हसीं अम्न-ओ-अमाँ का
रिवाज उस से मुआफ़ी का पड़ा है
जो की तलवार से अपनी हिफ़ाज़त
दिलों को फ़त्ह उल्फ़त से किया है
नसीब उस को हुई मेराज ऐसी
क़दम अर्श-ए-मुअल्ला पर गया है
हमारी जान वारी है उसी पर
मुहम्मद मुस्तफ़ा पर दिल फ़िदा है
मुझे रस्ता दिखाया है उसी ने
मेरे दिल का वही रोशन दिया है
पढ़ें सल्लि अला तारिक़ हमेशा
कि मोमिन को यही हुक्म-ए-ख़ुदा है
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल हिन्दी में
वो ले के आए थे रक़्स-ओ-सुरूद का तोहफ़ा
क़बूल हो गया, मेरा दुरूद का तोहफ़ा
फ़रिश्ते हर घड़ी उस पर सलाम भेजते हैं
दुरूद है उसे रब्ब-ए-वदूद का तोहफ़ा
बुलंद शान है उस की कि वो मुहम्मद है
मिला है उस को ख़ुदा से हमूद का तोहफ़ा
अरब गवाह रहे सिद्क़ और अमानत के
दिया उन्होंने उसे ख़ुद शुहूद का तोहफ़ा
उसी का नाम लिया है ख़ुदा के नाम के साथ
मिला है उस के लिए गो क़ुयूद का तोहफ़ा
किया है उस से मुहब्बत का हम ने दावा जब
मिला है मुल्क में अपने, हुदूद का तोहफ़ा
जमाल-ओ-हुस्न का पैकर, जहाँ का मुह्सिन है
वो ले के आया बहिश्त-ए-ख़ुलूद का तोहफ़ा
ख़ुदा ने भेजा है क़ुरआन जो हमारे लिए
हमें मिला है ये उस के वुरूद का तोहफ़ा
हुआ तुलूअ, जो वो बद्र, क्यों न शुक्र करें
ख़ुदा को पेश करें हम सुजूद का तोहफ़ा
पढ़ा करो उसे तारिक़ हमेशा सुबह-ओ-शाम
क़सीदा उस का, मसीह-ए-मौऊद का तोहफ़ा
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
लब पे ज़िक्र-ए-सफ़ा मुहम्मद का
विर्द सल्लि अला मुहम्मद का
मेरा मुह्सिन, मेरा हबीब है वो
मेरे दिल के बड़ा क़रीब है वो
आश्ना लुत्फ़ से ज़बान करूँ
कुछ सिफ़ात उस की मैं बयान करूँ
वो है रहमत ख़ुदा की सब के लिए
वो नमूना है रोज़-ओ-शब के लिए
इश्क़ यूँ उस को अपने रब से था
मुन्तज़िर उस का जैसे, कब से था
ज़िक्र करता था उस का कसरत से
आज भी लोग देखें हसरत से
उस ने उम्मी लक़ब तो पाया था
ख़ुद ख़ुदा ने उसे पढ़ाया था
इल्म-ओ-इरफ़ाँ का वो ख़ज़ाना था
उस का क़ाइल हुआ ज़माना था
जब ख़ुदा उस से हमकलाम हुआ
जारी क़ुरआन का निज़ाम हुआ
जब भी करता किसी को वो तबलीग़
बात करता था वो फ़सीह-ओ-बलीग़
उस की सबसे बड़ी जो ताक़त थी
उस की हर बात में सदाक़त थी
गुफ़्तगू उस की होती थी जामे
उस को सुनते थे शौक़ से सामे
मुख़्तसर जो कलाम करता था
दुश्मनों को भी राम करता था
की गई थी अता उसे हिकमत
रौब से दी गई उसे नुसरत
मआरिफ़त से भरी जो बातें थीं
थीं इबादत से पुर जो रातें थीं
मिल गई थी ख़बर ज़मानों की
कुंजियाँ दी गईं ख़ज़ानों की
वो तो हाज़िर हुआ ख़ुदा के हुज़ूर
छोड़ कर वो गया ख़ुदा का नूर
मिल गए अब हमें ख़ज़ाने वो
ढूँढ़ते हम हैं पर ज़माने वो
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नअत-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
ज़िक्र छेड़ा है एक माह-रुख़ का
ऐसी हिम्मत भला कहाँ मुझ को
इक हसीं तज़्किरा मुहब्बत का
तेरे जल्वों ने दी ज़बाँ मुझ को
इस क़दर रात का अँधेरा था
चश्म-ए-बीना मिली वहाँ मुझ को
ठोकरें खा के मैं तो गिर जाता
गर न मिलता तिरा निशाँ मुझ को
तेरी रहमत हुई है जल्वागर
शुक्र वाजिब कहाँ कहाँ मुझ को
तू ने कू-ए-सनम दिखाया है
था वो यार-ए-निहाँ, निहाँ मुझ को
सिद्क़ पेश-ए-नज़र हुआ जब से
तेरी अज़मत हुई अयाँ मुझ को
तेरा आना ख़ुदा का आना है
ऐसा वाज़ेह हुआ बयाँ मुझ को
तू ने मज़लूम की हिमायत में
दी वो जुरअत, मिली ज़बाँ मुझ को
हक़ असीरों ने पा लिये तुझ से
तेरे दर से मिली अमाँ मुझ को
तेरी तालीम से हुए प्यारे
सब यतीम और बेटियाँ मुझ को
बेशुमार इस क़दर तेरे एहसाँ
ग़ैर मुमकिन हुआ बयाँ मुझ को
दौर-ए-आख़िर में फिर से आएगा
तेरे मिलने का था गुमाँ मुझ को
चाँद गहना गया तो सूरज भी
तेरा रोशन हुआ निशाँ मुझ को
जब से दर पर तेरे सलाम किया
पाए दुश्मन भी मेहरबाँ मुझ को
तेरे आने से वो बहार आई
गुंचा-ओ-गुल हुआ जहाँ मुझ को
इश्क़ सब्र-आज़मा सुना था पर
और कितने हैं इम्तिहाँ मुझ को
मैं निछावर हज़ार बार करूँ
तुझ से प्यारी नहीं ये जाँ मुझ को
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नअत-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
सफ़र का शौक़ भी, मंज़िल की जुस्तजू भी है
तेरे विसाल की ख़्वाहिश भी आरज़ू भी है
अगरचे बंदे को निस्बत नहीं कोई तुझ से
मगर अज़ीज़ उसे, तेरी आबरू भी है
वो अर्श पर जिसे मिलने बुलाया ख़ुद तू ने
हुई फिर उस से मुलाक़ात रू-ब-रू भी है
किया फिर उस से मुहब्बत का तू ने जो इज़हार
गवाह उस की, तेरी तर्ज़-ए-गुफ़्तगू भी है
तिरा ही हुस्न झलकता है ख़ूबरुओं में
हबीब तिरा हसीन और ख़ूबरू भी है
तेरी सिफ़ात सभी जल्वागर हुईं उस में
तेरे नुक़ूश पे क़ायम वो नेक-ख़ू भी है
दुरूद उस पे सभी भेजते हैं सुबह-ओ-मसा
दिलों में प्यार है, ज़िक्र उस का, कू-ब-कू भी है
क़सीदा पढ़ने की तौफ़ीक़ मिल गई तुझ को
कि तारिक़ उस के ग़ुलामों में एक तू भी है
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
ख़ुदा के बंदों में सबसे आला, ख़ुदा का जो इक नज़ीर आया
वो सब जहानों में रहमतों का पयाम लेकर बशीर आया
जो ज़ुल्मतों के अमीक गढ़ों में गिर गए थे ज़लील होकर
वो पस्तियों से निकाल कर उनको देने ख़ैर-ए-कसीर आया
वो ज़ुल्म की चक्कियों में पिस कर हुए थे हैवान से भी अहक़र
अमान पाई ख़ुदा के बंदों ने अम्न का जब सफ़ीर आया
नहीं थे जिनके हुक़ूक़ कोई, ग़ुलाम रहते थे उम्र भर जो
उन्हें रिहाई दिला के उनको बनाने वाला अमीर आया
ख़ुदा की ख़ातिर जो दिन गुज़ारे, इबादतों में बिताईं रातें
न उस से पहले किसी ने देखा, वो आशिक़-ए-बेनज़ीर आया
ख़ुदा की रहमानियत का परतौ, रहीम था वो, करीम था वो
ख़ुदा का आशिक़ बनाने वाला, ख़ुदा का बन के नसीर आया
ख़ुदा के इरफ़ाँ का फ़ैज़ देकर किया है सेराब तिश्नगी को
अता समंदर थी जिस की, ऐसा वो मुनइम-ए-दिलपज़ीर आया
वो हुस्न-ओ-एहसाँ का ऐसा सूरज, न उस से पहले फ़लक ने देखा
किए जो रोशन ज़मीं-ज़माँ सब, मुक़द्दरों का क़दीर आया
ये चाँद चेहरा, सितारा आँखें, हुई हैं रोशन उसी की लौ से
मुहब्बतों की लतीफ़ गर्मी लिए वो मेहर-ए-मुनीर आया
वो उम्मियों का था फ़ख़्र जिस को ख़ुदा-ए-रहमान ने ख़ुद सिखाया
बताए क़ुरआँ के वो मआरिफ़, न उस सा आलिम कबीर आया
बुतान-ए-वहम-ओ-गुमाँ को तज कर, यक़ीं के ज़ेवर से बन सँवर के
ख़ुदा की तौहीद का पैम्बर, वो सबसे बढ़ कर, अख़ीर आया
ख़ुदा की ख़ातिर गुज़ारता था जो ज़िंदगी का हर एक लम्हा
हमारी बिगड़ी बनाने आख़िर उसी के दर का फ़क़ीर आया
ख़ुदा की जूद-ओ-सखा का मज़हर, अता हुआ जिस को हौज़-ए-कौसर
वहीं पे पहुँचा जो तिश्ना रूहों का एक जम्म-ए-ग़फ़ीर आया
उसी के दर पे पड़ा है तारिक़, उसी के घर का हुआ है मेहमाँ
ज़हे मुक़द्दर! वो उसके लुत्फ़-ओ-करम का हो के असीर आया
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
चश्मा-ए-फ़ैज़-ए-आम आया है
वो जो माह-ए-तमाम आया है
दिल की तारीकियाँ जो दूर करे
आसमाँ से कलाम आया है
बरकतें उस से पाईं क़ौमों ने
जब वो ख़ैरुल-अनाम आया है
वो जो प्यासे थे लोग सदियों से
दौड़ते हैं कि जाम आया है
उस से ली है गुलाब ने ख़ुशबू
वो गुलों का इमाम आया है
गुफ़्तगू जब कहीं भी चलती है
बार-बार उस का नाम आया है
कहते फिरते हैं लोग दुनिया में
रब का आशिक़ ग़ुलाम आया है
उस ने धोया दिलों को लफ़्ज़ों से
उस से ये एहतिमाम आया है
जो भी आया है उस की महफ़िल में
फिर ब-सद एहतिराम आया है
साथ उस के जो चल दिए लेकिन
उन पे मुश्किल मुक़ाम आया है
चाहने वाले बढ़ गए उस के
उस का लुत्फ़ ऐसा काम आया है
प्यार से देखा सारी गलियों को
वो जहाँ सुबह-ओ-शाम आया है
जिस को आई सदाए सल्लि अला
और ख़ुदा का सलाम आया है
रश्क तारिक़ है ख़ुशनसीबी पर
उस की उम्मत में नाम आया है
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
जाँ तेरे कूचा में आ कर ये फ़ना हो जाती
मुझ को गर क़ुव्वत-ए-परवाज़ अता हो जाती
बारहा सोचा ये देखूँ तेरा रौज़ा मैं भी
देखता आ के जो हाइल न हया हो जाती
देख लेता जो अदू, चेहरा तिरा, ग़ौर के साथ
रोशनी चेहरे की, आँखों की ज़िया हो जाती
बेटियों, बहनों की इज़्ज़त हुई क़ायम तुझ से
सर पे उन के थी, रिदा तेरी दुआ हो जाती
भेजता है जो ख़ुदा साथ फ़रिश्तों के दुरूद
तू जहाँ होता, मुअत्तर थी फ़िज़ा हो जाती
ऐसा करता था असर, ज़ीस्त का अंदाज़ तिरा
दिल से दुनिया की मुहब्बत थी, जुदा हो जाती
एक ख़्वाहिश हो जो पूरी तो है अंजाम बख़ैर
मेरी हर साँस में बस तुझ से वफ़ा हो जाती
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
ज़िक्र हो इस माह में, माह-ए-अरब ﷺ का बार-बार
नेमतों में, सबसे बढ़ कर उस की रहमत का शुमार
क़ुव्वत-ए-क़ुदसी है उस की जिस से सारे फल लगे
उस के दम से हर तरफ़ फैले हैं अब बाग़-ओ-बहार
हुस्न और अख़्लाक़ का कामिल नमूना उस की ज़ात
वो ख़ुदा की क़ुदरतों का देख लो है शाहकार
उस से पहले कब नज़र आया कोई ऐसा हसीं
साथ उस के हो गए, सब छोड़ कर अपने दियार
सब मुख़ालिफ़ हो गए, उस ने ज़रा परवा न की
दे दिया पैग़ाम-ए-हक़, गरचे सहे दुश्मन के वार
हो गए दुश्मन भी क़ाइल, इश्क़ उस को रब से है
दी गवाही सब ने है, उस को फ़क़त रब से ही प्यार
ख़ुम लुढ़काते, नाज़नीनों से जिन्हें फ़ुर्सत न थी
आ गए सब छोड़ कर, उस के लिए दीवाना-वार
याद करना अपने रब को हर घड़ी मामूल था
ज़िक्र हर पल प्यार से करता था उस का बार-बार
“सद हज़ाराँ यूसुफ़े बीनम दरें चाह-ए-ज़क़न
वाँ मसीह-ए-नासरी शुद अज़ दम-ए-ऊ बेशुमार”
ऐ ख़ुदा! रंजूर हैं, इस पर ख़िज़ाँ का दौर है
फिर मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के बाग़ में आए बहार
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
जिस तरफ़ देखें उसी का नूर है फैला हुआ
वो मुहम्मद मुस्तफ़ा, उस सा न कोई दूसरा
है वही तो माह-लिक़ा, बद्रुद्दुजा, नज्मुल-हुदा
हर तरफ़ फैली ज़िया जिस की, है वो शम्सुद्दुहा
है वही ख़ैरुल-वरा, ख़ैरुल-बशर, ख़ातमुर-रसुल
अंबिया का रहनुमा, मौला-ए-कुल, ऐनुश्शिफ़ा
हुस्न-ओ-एहसाँ में नज़र आए कहाँ उस की नज़ीर
देख कर अख़्लाक़, दुश्मन भी कहें सद मरहबा
हो गए क़ाइल सभी हो कर मुहब्बत के असीर
अश्जअुश्शुजआन, फ़ैज़ान-ए-नुबुव्वत से भरा
वो यतीमों से मुहब्बत की था इक आला मिसाल
वो असीरों की रिहाई का सबब आ कर बना
बादशाही में भी सारी ज़िंदगी सादा रही
अब्द-ए-कामिल, है नमूना उस का ज़ुह्द-ओ-इत्तक़ा
क्यों न तारिक़ हर घड़ी भेजें दुरूद उस ज़ात पर
जब ख़ुदा भेजे दुरूद उस पर, फ़रिश्ते भी सदा
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
हाल नज़ील, प्रेस्टैटिन, नॉर्थ वेल्स
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
“भेज दुरूद उस मुह्सिन पर तू दिन में सौ-सौ बार”
“पाक मुहम्मद मुस्तफ़ा, नबियों का सरदार ﷺ”
ख़ैरा कर दे चेहरा, दिल पर, नाज़िल हों अनवार
उस के आगे मूसा, ईसा खड़े हुए अबरार
सब से ऊँचा तख़्त उसी का, आए नबी हज़ार
उस पर भेज दुरूद, दुआ कर, होगी अर्श के पार
रोक सकेगी उस को क्योंकर फिर कोई दीवार
वो नाव को तूफ़ानों में ले कर जाए पार
चलता है जो उस के पीछे, दे वो पार उतार
भेज दुरूद उसी पर, दिन भर, यूँ ही रात गुज़ार
उस को यार बना ले जल्दी, जीवन के दिन चार
छोड़ के जाएँगे कैसे जब एक वही सरदार
उस के साथ किए हैं हम ने पक्के क़ौल-ओ-क़रार
उस का चेहरा देख के उस पर दें हम सब कुछ वार
दीन से उल्फ़त, सब से बेहतर, हेच है ये संसार
तारिक़! नाम मुहम्मद सुन कर रहा न जाए यार
“भेज दुरूद उस मुह्सिन पर तू दिन में सौ-सौ बार”
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
ख़ुदा करे मेरे लब पर तिरा ही नाम आए
सुकून दिल को मिले, जब तिरा पैग़ाम आए
हो ज़िक्र आप का तो रहमतों की बारिश हो
दुरूद पढ़ के सुकूं दिल को सुबह-ओ-शाम आए
मदीने जा के बसूँ मैं, यही तमन्ना है
ज़ुबाँ पे सामने रौज़ा के, ख़ुश-कलाम आए
नबी ﷺ का दर है कि जूद-ओ-करम का चश्मा है
मिले हर एक को इरफ़ान का जो जाम आए
नबी ﷺ की सीरत-ओ-सुन्नत से रोशनी पाएँ
जहाँ में अम्न हो और दिल में एहतिशाम आए
ख़ुदा के घर का भी आसान हो सफ़र मेरा
नबी ﷺ का ज़िक्र हो, काबा का जब मुक़ाम आए
शफ़ाअत उन की मिले प्यार करने वालों को
जो उन पे भेजें दुरूद, उन्हें उन का भी सलाम आए
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा, लंदन
नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
मुहम्मद ﷺ मुह्सिन-ए-इंसानियत, रहमत दो आलम के
वही हैं राहत-ए-जाँ, हाँ वही साक़ी हैं ज़मज़म के
फ़लक से अब्र बरसा जिस में इक आब-ए-हयात उतरा
नज़र आया कि फूलों पर गिरे क़तरे थे शबनम के
नबी ﷺ के ख़ुल्क आईना हैं, दिल अनवार से भर दें
वही था सिलसिला, आख़िर में आए थे वो आदम के
नहीं कोई मिसाल उन की, वही इक फ़ख़्र-ए-आलम हैं
कि नीचे आ गए सारे नबी ही उन के परचम के
ख़िज़ाँ के बाद आती है बहार उन के इशारे से
चमन में फूल खिलते हैं उन्हीं के दम से मौसम के
कभी ये प्यार की लौ, दिल से मद्धम हो नहीं सकती
कि उन के नूर के दम से दिए रोशन हैं आलम के
मदीने की ज़ियारत हो, ये ख़्वाहिश दिल में रहती है
शफ़ाअत की सख़ावत में, नबी वाले हैं हातिम के
वही तो राहत-ए-जाँ हैं, दुरूद उन पर, सलाम उन पर
मुहम्मद ﷺ जो कि हैं महबूब, तारिक़ सारे आलम के
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
नअत-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
तुझ पे क़ुर्बान मिरी जान, मदीने वाले
तुझ पे कामिल मिरा ईमान, मदीने वाले
ज़ेब लौलाक लमा का तुझे देता है ख़िताब
सोच से ऊँची तिरी शान, मदीने वाले
दीन कामिल हुआ, उतरी जो किताब-ए-फ़ुरक़ाँ
तुझ पे नाज़िल हुआ क़ुरआन, मदीने वाले
है अबद तक तिरा क़ानून-ए-शरीअत जारी
है ख़ुदा का यही फ़रमान, मदीने वाले
दश्त सरसब्ज़ हुए जिस की बदौलत सारे
तू वो रहमत का है बारान, मदीने वाले
रब को पहचानोगे, ख़ुद को है अगर पहचाना
तुझ को हासिल है ये इरफ़ान, मदीने वाले
लाजरम ख़त्म हुईं नेमतें तुझ पर सारी
अब तिरा जारी है फ़ैज़ान, मदीने वाले
मद्ह में तेरी क़सीदे कहे जिस ने आका
है तिरा महदी-ए-दौराँ, मदीने वाले
मआरिफ़त जिस ने तिरी पाई, वो दीवाना हुआ
उस को हासिल हुआ वज्दान, मदीने वाले
जिस की सीरत में नज़र आए तिरा क़ौल-ओ-अमल
पेश करता है वो बुर्हान, मदीने वाले
तू मुहब्बत है सरापा, तो ये नफ़रत कैसी
इस पे हैरान हैं इंसान, मदीने वाले
है मुहब्बत का तक़ाज़ा तिरे उस्वे पे चलें
काश समझें ये मुसलमान, मदीने वाले
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
नात ए रसूल ए मक़बूल
रोशनी के सब सितारे, हैं हिदायत के गवाह
अज़्म-ए-हक़ के सब सहीफ़े, हैं शुजाअत के गवाह
सुल्ह के पैग़ाम से महका जहाँ का हर मकाँ
अमन की ख़ुशबू के झोंके, हैं शराफ़त के गवाह
दर्दमंदों का सहारा और ग़रीबों की पनाह
रहमतों के सब ख़ज़ाने, हैं सख़ावत के गवाह
जो तिरी दहलीज़ पर आया, है पाया उस ने अम्न
क़ल्ब-ए-मुज़्तर, अश्क-ए-जारी, हैं इनायत के गवाह
दुश्मनों को भी मुहब्बत से नवाज़ा इस तरह
जाँ के दरपे थे जो दुश्मन, हैं मुरव्वत के गवाह
सच की ख़ातिर तू ने लहराए थे जुरअत से अलम
हक़परस्ती के ये परचम, हैं सदाक़त के गवाह
ज़ुल्म और जौर-ओ-जफ़ा सह कर रहे साबित-क़दम
सब्र के क़िस्से तिरे, हैं इस्तिक़ामत के गवाह
जंग में इंसाफ़ का मियार जो तू ने रखा
सख़्त मुजरिम-ए-जंग भी, हैं अदालत के गवाह
आज भी ज़ुल्मत उजाला ढूँढ़ती है जिस तरफ़
रोशनी के ये ज़माने, हैं बिसारत के गवाह
हम गुनहगारों में हैं, फिर भी तिरी उम्मत तो हैं
ऐ मुहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ, हम हैं शफ़ाअत के गवाह
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
रसूल-ए-रहमत
नअत-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
रोशनी का वो इशारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
जिस को दुश्मन ने पुकारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
अद्ल-ओ-इंसाफ़ की सूरत वो मिला दुनिया को
बे-क़ुसूरों का सहारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
आग बरसाती हुई धूप में ठंडक का समाँ
अब्र वो रब ने उतारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
सुल्ह की ले के बशारत जो चला आया है
अम्न का एक वो धारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
जाम-ए-इरफ़ान के हाथों में लिए साक़ी वो
हौज़-ए-कौसर पे हमारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
दिल जो दुश्मन का किया फ़त्ह, मुआफ़ी दे कर
ख़ुद ज़बाँ से वो पुकारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
बुत दिए तोड़, किया नारा-ए-तकबीर बुलंद
हक़ का वल्लाह नज़ारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
जितने भी आए हैं दुनिया में नबी और रसूल
सब का सरदार, दुलारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
उस पे तारिक़ का हमेशा हो दुरूद और सलाम
वो जो हम सब ही का प्यारा है रसूल-ए-रहमत ﷺ
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
नअत-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ
चराग़-ए-रहमत-ए-आलम तिरा दरबार है आका ﷺ
मता-ए-अम्न-ए-दो आलम तिरा किरदार है आका ﷺ
सभी तिश्ना-लबों के वास्ते बहर-ए-बक़ा तू है
शिफ़ा की इक दुआ-ए-ख़ास तेरा प्यार है आका ﷺ
जहाँ में अद्ल का डंका बजा है तेरे आने से
तिरे ख़ुल्क-ओ-मुहब्बत पर फ़िदा संसार है आका ﷺ
यतीमों के लिए साया, ग़ुलामों के लिए शफ़क़त
तिरी हिजरत पे शाहिद हो गया इक ग़ार है आका ﷺ
तिरी सोहबत में रह कर जिस किसी ने तुझ से सीखा है
वफ़ा के बाब में वह बन गया शाहकार है आका ﷺ
जहालत के अंधेरों से निकाला तू ने उम्मत को
उलूम-ओ-हिकमत-ओ-दानिश का तू मेयार है आका ﷺ
उखुव्वत का दिया है दर्स बाहम, अद्ल कर के भी
मुहब्बत से चला जितना तिरा दरबार है आका ﷺ
दिलों के हौसले को पस्तियों से सरबुलंदी दी
हुआ जीने का मक़सद ही तिरा दीदार है आका ﷺ
जहाँ में अम्न की ख़ुशबू तिरे दामन से वाबस्ता
वफ़ा के क़ाफ़िलों का क़ाइद-ओ-मेअमार है आका ﷺ
ख़ुशा-क़िस्मत! ग़ुलामों में तिरे तारिक़ हुआ शामिल
ज़माना जानता है तू शह-ए-अबरार है आका ﷺ
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
नातिया ग़ज़ल
इस्म-ए-अहमद से मुहब्बत जो कोई अपनाएगा
रोज़-ए-महशर उस तअल्लुक़ से वो बख्शा जाएगा
हर फ़िज़ा, हर रोशनी, हर दिल में उस का नूर है
जो भी देखेगा रुख़-ए-अहमद, सब उस में पाएगा
चाँद की किरनें, सितारों की चमक बोलेगी यूँ
ये जहाँ हुस्न-ए-मुहम्मद से हसीं कहलाएगा
नकहत-ए-तैयबा से है मामूर वह बाद-ए-सबा
ज़िक्र जब आएगा लब पर, दिल महकता जाएगा
जिस ने उस के नाम की हुरमत को रखा है अज़ीज़
अर्श से रहमत का साया उस के सर पर छाएगा
गुंबद-ए-ख़ज़रा पर टिक जाएगी जब तेरी नज़र
ज़िंदगी का हर अँधेरा नूर में ढल जाएगा
वो गली-कूचे महकते जाएँगे सदियों तलक
जो दुरूद उस पर पढ़ेगा, फ़ैज़ उस का पाएगा
आईना दिल का अगर हो साफ़ तो ये देखना
मुस्तफ़ा ﷺ का उस में चेहरा ख़ुद नज़र आ जाएगा
कोई दम उस के तबस्सुम का असर पाए अगर
मुस्कराहट सब के होंठों पर अचानक लाएगा
नाम-ए-अहमद में छुपा है ज़ीस्त की राहत का राज़
जो सलाम उस पर पढ़ेगा, वो ख़ुशी ही पाएगा
चार सू ख़ुशबू से महकेगी मदीने की फ़िज़ा
बेख़ुदी में, जब कभी तारिक़ؔ, क़सीदा गाएगा
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
नातिया ग़ज़ल
मिसरा-ए-तरह: उन ﷺ सा कोई अरब में, अज़म में कहाँ
“उन ﷺ सा कोई अरब में, अज़म में कहाँ”
दूसरा ऐसा, अहल-ए-करम में कहाँ
आप ﷺ की ज़ात रहमत, सरापा अता
ऐसी शफ़क़त किसी भी सनम में कहाँ
आप ﷺ के ज़िक्र से दिल को राहत मिली
ऐसी तस्कीं किसी तख़्त-ए-जम में कहाँ
आप ﷺ के नाम से दिल सुकूँ पा गए
ऐसी ठंडक किसी भी करम में कहाँ
आप ﷺ के ख़ुल्क सी क्या मिसालें मिलें
ऐसी अज़मत किसी मोहतरम में कहाँ
आप ﷺ ने ज़ुल्मतों को उजाला दिया
ऐसा सूरज किसी भी हरम में कहाँ
आप ﷺ की राह में जो वफ़ा से चला
उस को फिर ख़ौफ़ दुनिया के ग़म में कहाँ
आप ﷺ की राह सीधी, रह-ए-ख़ुल्द है
ऐसी राह-ए-यक़ीं, पेच-ओ-ख़म में कहाँ
आप ﷺ के नक़्श-ए-पा, वस्ल के रहनुमा
ऐसी मंज़िल है लौह-ओ-क़लम में कहाँ
आप ﷺ का ज़िक्र तारिक़ؔ है ईमान की जाँ
वरना ये जाँ क़ुर्ब-ए-इरम में कहाँ
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
याद-ए-हबीब ﷺ
बत्हा की वादियों में जो इक माह-जबीं हुआ
उस का ही हुस्न दिल में मिरे जा-गज़ीं हुआ
दीदार-ए-हुस्न उस का भी ऐ काश हो नसीब
आने से जिस के सारा ही आलम हसीं हुआ
ला रैब अअला मर्तबा, अरफ़अ मक़ाम में
उस के वजूद से तो ख़ुदा ख़ुद क़रीं हुआ
अख़्लाक़ उस के देख के ताइफ़ के शहर में
है संग-दिल भी उस की नज़र से नगीं हुआ
हालत है उस की याद में क्या पूछते हो तुम
है कब से उस के प्यार का दिल ये मकीं हुआ
ख़ाक-ए-हरम लगी तो बदलने लगा वजूद
आँखें हैं अश्कबार, मिरा दिल हज़ीं हुआ
तारिक़ क़सीदा उस का जो पढ़ते हो रोज़ तुम
मानो क़बूल, बर सर-ए-अर्श-ए-बरीं हुआ
डॉक्टर तारिक़ؔ अनवर बाजवा – लंदन
क़सीदा फ़ी मिद्ह-ए-नबी ﷺ
१. तश्बीब (इश्क़ व जज़्बा, आग़ाज़ की फ़ज़ा-बंदी)
१. ऐ ख़ुदा के फ़ैज़ और इरफ़ान के चश्मे रवाँ
तिश्ना-लब दौड़े चले आते हैं तुझ तक कारवाँ
२. हर दिल-ए-मुज़्तर में तेरी याद की ख़ुशबू बसी
हर किसी पर तेरे ही एहसान के हैं साइबाँ
३. चाँद सूरज, कहकशाँ, सब तेरे जल्वे के असीर
नूर की सूरत हुआ है, आसमाँ भी ज़ो-फ़िशाँ
४. सब्ज़ा-ओ-गुल, अब्र क्या हैं तेरे जल्वों की धनक
बाद-ए-सरसर भी तेरी रहमत से पाती है ज़बाँ
५. नख़्ल-ए-उम्मीदों का तेरे फ़ैज़ से है ताज़ा-तर
तेरी ही ख़ुशबू से है आबाद दिल का गुलिस्ताँ
६. बहर-ए-हिकमत के किनारे पर उतरता है सुकूँ
हो तेरे पैग़ाम ही से इल्म का दरिया रवाँ
७. चार सू अफ़लाक पर तेरे सितारों का हिसार
तू चमकता है मह-ए-कामिल हो जैसे दरमियाँ
८. तेरे ही दम से खुले इंसानियत का बाब-ए-ख़ैर
वरना वहशत ही थी हर सू, इल्म का था उस्तुख़्वाँ
९. ऐ करम के बाब, ऐ तस्कीन-ए-क़ल्ब-ए-मुज़्तरिब
जानते हैं तेरी चाहत है वफ़ा का इम्तिहाँ
۲۔ ग़ुरेज़ (तश्बीब से मद्ह की तरफ़ पुल)
१०. गुल खिले, कलियाँ हँसीं, है रंग-ओ-ख़ुशबू से बहार
रोशनी ने पाया जलवा, चाँदनी है शादमाँ
११. अब बताऊँ किस का सद्क़-ओ-अद्ल था दिल के क़रीब
किस के अख़्लाक़-ए-करीमाना का शोहरा था वहाँ
१२. किस की आमद से मिटा ज़ुल्मत का बेपायाँ हिसार
किस के दम से खुल गया रहमत का बाब-ए-बेकराँ
१३. किस ने अम्न-ओ-सुल्ह के फ़र्ज़ंद पैदा कर दिए?
किस ने नफ़रत को मिटाया दे के उल्फ़त का निशाँ
१४. किस ने काबे को कहा आओ, है ये दार-उस-सलाम
किस ने सहरा को बनाया इल्म-ओ-हिकमत का जहाँ?
१५. किस के क़दमों से बनी इंसानियत राह-ए-निजात
किस के दम से रूह को हासिल हुआ इरफ़ान-ए-जाँ
३। मिद्ह (सीरत-ए-नबी ﷺ का बयान)
१६. इक वही हस्ती है जिस के साथ ख़ैर-ए-कुल मिला
है वही रहबर, वही है रहनुमाए हर ज़माँ
१७. वक़्त के लम्हे शहादत पर रहा उस का अमल
उस की सीरत, उस्वा-ए-कामिल का क़ुरआँ में बयाँ
१८. ऐ मिरे दिल! चल मदीने की तरफ़ हूँ अब रवाँ
वाँ पे महबूब-ए-ख़ुदा ﷺ हैं बाइस-ए-अम्न-ओ-अमाँ
१९. रहमत-ए-हक़ का हुआ मक्का में जो जलवा अयाँ
नूर से उस के हुए मामूर सब क़ौन-ओ-मकाँ
२०. तूर पर मूसाؑ ने देखा रोशनी का इक निशाँ
और मदीना में मुहम्मद ﷺ को मिला दीदार-ए-जाँ
२१. ज़िक्र-ए-अहमद से हुए रोशन सभी हैं बहर-ओ-बर्र
मुस्तफ़ा ﷺ को रब ने बख्शी इज़्ज़त-ए-हर दो जहाँ
२२. उन पर जिब्रील-ए-अमीन लाते रहे रब का पयाम
रफ़्ता-रफ़्ता यूँ हुआ नाज़िल कलाम-ए-जाविदाँ
२३. अर्ज़-ओ-अफ़लाक़-ओ-ज़माना, हर तरफ़ उन का जमाल
ख़ुद ख़ुदा ने नाम उन का कर दिया सब पर अयाँ
२४. चश्म-ए-आलम हो गई रोशन उन्हीं के फ़ैज़ से
उन के इल्म-ओ-मआरिफ़त से हो गया उजला जहाँ
२५. उन के इस्म-ए-पाक की बरकत से मिलती है शिफ़ा
उन के दम से दूर हो जाएँ मर्ज़-ए-दिल के निहाँ
२६. आप ﷺ वह रहबर हैं जिन के नक़्श-ए-पा पर चल के हम
पा गए तस्कीन-ए-दिल, उल्फ़त का रोशन इक निशाँ
२७. आप ﷺ की रहमत ने जीते दुश्मनों के दिल भी थे
आप ﷺ के दम से हुई आबाद बज़्म-ए-दोस्ताँ
२८. आप ﷺ की गुफ़्तार में क़ुरआन की ख़ुशबू बसी
आप ﷺ के किरदार में सिद्क़-ओ-वफ़ा की कहकशाँ
२९. आप ﷺ के लब से जो निकले सब थे अल्फ़ाज़-ए-करम
वह बने इंसानियत के वास्ते हरफ़-ए-अमाँ
३०. आप ﷺ हर इक रज़्म में फ़ातेह तरीं सालार-ए-जंग
आप ﷺ थे सब्र-ओ-शुजाअत के अमीर-ए-कारवाँ
३१. अम्न-ए-आलम का दिया था आप ने ऐसा चराग़
जिस से रोशन है ज़माने का हर इक गोशा, मकाँ
३२. आप ﷺ ने ही तो बताया, सुल्ह में ही ख़ैर है
आप ﷺ ने ही तो सिखाया अफ़्व का हर इक बयाँ
३३. आप ﷺ ही हैं रहमत-ए-आलम भी और नूर-ए-हुदा
आप ﷺ इक हैं शाफ़े-ए-महशर, हुए सब की अमाँ
३४. आप ﷺ का ही उस्वा-ए-कामिल रज़ा का है सबब
आप ﷺ ही के वास्ते से दूर हो दिल की ख़िज़ाँ
४. दुआ (हज़ूर ﷺ के लिए)
३५. ऐ ख़ुदा! महबूब के सदक़े अता फ़रमा हमें
फिर से सुल्ह व आश्ती, बर हर मकाँ अम्न व अमाँ
३६. आप ﷺ ही के नाम से मिल जाए फिर तस्कीन-ए-दिल
आप ﷺ ही के ज़िक्र से रौशन हो हर दिल का जहाँ
३७. आप ﷺ की सीरत से होकर हर घड़ी हम फ़ैज़याब
आप ﷺ के नक़्श-ए-क़दम पर जब चलें, हों कामराँ
३८. आप ﷺ की उम्मत रहे महफ़ूज़ हर शैतान से
वसवसे उसको न बहकाएँ, दज्ल हों बातिलाँ
३९. कुदसियों को फिर मिले तौफ़ीक़ तेरे साथ की
फिर से हो जाए मयस्सर मद्हतों का वो ज़माँ
४०. रोज़-ए-महशर हम ग़रीबों पर भी हो तेरी नज़र
हम को बख्शी जाए तेरे दस्त-ओ-बाज़ू की कमाँ
४१. आप के सदक़े मिले दिल को सुकून व रौशनी
आप ही के फ़ैज़ से सेराब हो सारा जहाँ
४२. हम को बख्शें, वो शफ़ाअत का सहारा रोज़-ए-हश्र
हम करें दीदार जब हो बे-हिजाबी का समाँ
४३. ऐ ख़ुदा! रखना हमें उनके करम के साए में
उनके सदक़े बख्श देना, हैं वही तो जान-ए-जाँ
४४. हम करें ऐसे अमल, पाएँ शफ़ाअत या नबी ﷺ
रोज़-ए-महशर हम पे भी लुत्फ़ व करम का हो समाँ
४५. ऐ ख़ुदा! अपने नबी पर भेज तू हर दम दरूद
अब वो ये दुनिया हो या फिर आख़िरत का हो ज़माँ
५. हुस्न-ए-तलब (शायर की दरख़्वास्त व अर्ज़)
४६. या नबी ﷺ, हम बेसहारा, आप ही हैं चारागर
हम ग़रीबों के लिए बन जाएँ रहमत का निशाँ
४७. रोज़-ए-महशर हम ख़ताकारों पे हो नज़र-ए-करम
हम गुनाहों के अँधेरों से निकल पाएँ वहाँ
४८. अपनी उम्मत में लिखें हम को भी ऐ प्यारे हुज़ूर ﷺ
हम को बख्शा जाए इनआम-ए-शफ़ाअत नागहाँ
४९. मुस्तफ़ा ﷺ के दर पे जाएँ, इल्तिजाएँ ले के हम
बख्श दे ये आरज़ू, करती रहे हर दम ज़बाँ
५०. आप ﷺ ही की मद्ह में कहता हूँ मैं अशआर सब
गर क़बूल उफ्तद ज़हे इज़्ज़-ओ-शरफ़, ऐ मेहरबाँ!
५१. ये दुआ है फिर मदीने के गली-कूचों में हूँ
अब्र-ए-रहमत का रहे सर पर हमारे साइबाँ
५२. आप ﷺ के रौज़े पे हो जब-जब हमारी हाज़िरी
आँख के आँसू कहें दिल की हमारे दास्ताँ
५३. हम कहें अल्फ़ाज़ सब तेरी सना के बाब में
दे हमें तौफ़ीक़-ए-मद्हत, हो रवाँ ऐसी ज़बाँ
५४. या इलाही, आप ﷺ के सदक़े अता फ़रमा हमें
मिल्लत-ए-अहमद को फिर मिल जाएँ दीन के पासबाँ
५५. ऐ शफ़ीअ-ए-उम्मत-ए-मजरूह-ए-इसयाँ, अलमदद
तेरी रहमत से हुए ज़ुल्मत के सहरा, गुलिस्ताँ
५६. तेरी उल्फ़त ने दिलों में नूर को उजला दिया
तेरी हुरमत से हुए महफ़ूज़ सब ईमान व जाँ
५७. ऐ सरापा ख़ैर व हमदर्दी के पैकर मेहरबाँ
तेरी सीरत है चराग़-ए-राह, हर दिल की अमाँ
५८. जिस पे टूटे ग़म, उसे तेरे सहारे का यक़ीं
कायनात-ए-दहर में तेरे करम का है समाँ
५९. ज़िक्र तेरा है शिफ़ा, तेरी दुआ है साइबाँ
तुझ से बढ़कर कौन है रहमत का पैकर मेहरबाँ
६०. दस्त-ए-अनवर ने दिया इंसानियत का दर्स वो
अदल व हिकमत पर हुए क़ायम हुकूमत के निशाँ
६१. ऐ मदीना! तेरी गलियों में पड़े उसके क़दम
ख़ाक उनकी चूमने को बेक़रार अब है जहाँ
६२. तेरी अज़मत पर गवाही दे ज़मीं व आसमाँ
ऐ नबी ﷺ! तुझ से हुआ मामूर दिल का गुलिस्ताँ
६३. तेरे दम से है उजाला, तू दिलों की कहकशाँ
ज़ुल्मत-ए-दौराँ में रौशन तू चराग़-ए-जाविदाँ
६४. रहमत-ए-आलम, शफ़ीअ-उल-मुज़्निबीं, अब्र-ए-करम
तेरे सदक़े में यहाँ क़ायम हुए दारुल-अमाँ
६५. क्या बयाँ हो तेरी शफ़क़त का समंदर बेकराँ
है फ़िदा होने को दिल, बेताब है मेरी ज़बाँ
६६. नाम तेरा है शिफ़ा, तस्कीन-ए-दिल, आराम-ए-जाँ
ज़िक्र तेरा ही फ़क़त मोमिन दिलों की दास्ताँ
६७. तेरी सीरत एक नमूना है हुकूमत के लिए
अदल तेरा है तरीक़-ए-ज़िंदगी का कारवाँ
६८. तेरे रौज़े पर फ़लक बन कर रहा है साइबाँ
हैं ज़मीं व आसमाँ, तेरी सदाक़त के निशाँ
६९. तेरी उल्फ़त का सिला है अम्न व उल्फ़त का समाँ
तुझ से रौशन हैं दिलों के रास्ते और कारवाँ
७०. तेरे रौज़े की तरफ़ उड़ते हैं दिल, परवाना-वार
तेरा शौक़ आँखों में ले आया है अश्कों का समाँ
समाप्ति
डॉक्टर तारिक़ अनवर बाजवा – लंदन
११ सितम्बर
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