नात-ए-पाक ब-हुज़ूर सरवर-ए-कायनात : ज़िंदगी की कुल्फ़तों पर कैफ़ तारी कर गई
नात-ए-पाक ब-हुज़ूर सरवर-ए-कायनात ﷺ
तरह मिसरा
"नोक-ए-मिज़गाँ देखिए क्या हुस्नकारी कर गई"
नात-ए-पाक
ज़िंदगी की कुल्फ़तों पर कैफ़ तारी कर गई
उल्फ़त-ए-सरकार ﷺ दिल की आबियारी कर गई
नफ़्सा-नफ़्सी के फ़ुसूँ को चाक कर के रख दिया
आमद-ए-मुख़्तार ﷺ यूँ बाद-ए-बहाऱी कर गई
ज़ुल्मत-ए-दीजूर थी चारों तरफ़ छाई हुई
काम इक हब्शी की आख़िर इन्किसारी कर गई
मोजिज़ात-ए-मुस्तफ़ा ﷺ पे मेरा तन, मन, धन फ़िदा
आप ﷺ की सीरत जहाँ में मीनाकारी कर गई
आल हैं, औलाद हैं हम सैय्यदुल-अबरार ﷺ की
हम पे यह एहसान यारो ज़ात-ए-बारी ﷻ कर गई
दफ़्तर-ए-आमाल मा अज़ हद सियाह ओ सूख़्ता
इस में कुछ तख़्फ़ीफ़ मेरी अश्कबारी कर गई
कर्बला की सरज़मीं पर ऐ हुसैन इब्न-ए-अली
नोक-ए-नेज़ा की तिलावत लरज़ा तारी कर गई
यह मेरे सरकार-ए-दो आलम ﷺ का ही फ़ैज़ान है
"नोक-ए-मिज़गाँ देखिए क्या हुस्नकारी कर गई"
मुतमइन हूँ मैं सुख़न की दौलत-ए-रिज़वाँ से
निस्बत-ए-ज़हरा यह रिश्ता इस्तिवारी कर गई
कलाम अज़:
हाजी सैयद रिज़वान हैदर रिज़वाँ
हाल मुक़ीम रावलपिंडी
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