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नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल : लर्ज़ाँ थे अँधेरे सब इक आप के आने से

नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल : लर्ज़ाँ थे अँधेरे सब इक आप के आने से


madina


नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल


लर्ज़ाँ थे अँधेरे सब इक आप के आने से
वो ज़ुल्म मिटा था यूँ बेदर्द ज़माने से

तौहफ़ा ये नमाज़ों का आका को दिया रब ने
जन्नत के खुले दर हैं मेराज को जाने से

तारीख़ ये शाहिद है उस दौर-ए-जहालत की
ये दीन-ए-ख़ुदा का तो उभरा है दबाने से

हर राह हिदायत की आका ने बताई है
जन्नत की वो दौलत लो क़ुरआँ के ख़ज़ाने से

मग़लूब किया उनको अल्लाह ने तो इक दिन
जो बाज़ न आते थे आका को सताने से

इस्लाम हिदायत की ये आप ने उम्मत को
ख़ुश होता ख़ुदा भी है गिरतों को उठाने से

इस्लाम शिकारपुरी
शिकारपुर
इंडिया

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