मर्सिया : दर ज़िक्र सरकार-ए-वफ़ा अब्बास अलमदार
मर्सिया
दर ज़िक्र सरकार-ए-वफ़ा अब्बास अलमदार
फिर मौज में है फ़िक्र का तूफ़ान-ए-बलाग़त
फिर अज़्म-ए-क़लम चूम रहा है रुख़-ए-मद्हत
मैदान-ए-सुख़न में है बपा हश्र की साअत
लर्ज़ीदा है बातिल, है अयाँ हक़ की ज़लालत
लिखता हूँ शहंशाह-ए-वफ़ा का मैं सरापा
थर्राए जिसे देख के ख़ुद लश्कर-ए-अअदा
फिर रन में अलमदार-ए-जरी, सफ़-शिकन आया
वो हैदर-ए-क़र्रार का गुल-पैरहन आया
बिजली की तरह कुफ़्र पे जो तेग़ज़न आया
अब्बास-ए-दिलावर सू-ए-दश्त-ए-मिहन आया
हिलने लगी धरती, यूँ लरज़ने लगा लश्कर
अब्बास बढ़े रन में तो याद आ गए हैदर
इक शोर, ग़ज़बनाक है अब शेर-ए-इलाही
छाने लगी अअदा के वो चेहरों पे सियाही
बख्शेगी अमाँ किस को ये ग़ाज़ी की गवाही
भागेगा किधर छोड़ के अब लश्कर-ए-शाही
वो ग़ैज़ का आलम है कि हैं फ़ौजें भी लरज़ाँ
क़ब्ज़े में है अब मौत, तो शमशीर है उरियाँ!
चमकी जो वो शमशीर तो लश्कर में मचा शोर
ताक़त न किसी में थी, रहा अब न कोई ज़ोर
अब्बास की हैबत का निराला था हर इक तौर
तलवार थी या बर्क़ जो गिरती थी अलल-फ़ौर
हैराँ थी क़ज़ा देख के ग़ाज़ी की लड़ाई
दी लश्कर-ए-अश्रार ने मक़तल में दुहाई!
जब नहर पे पहुँचा वो शहंशाह-ए-वफ़ादार
चुल्लू में लिया पानी तो याद आए यूँ सरकार
नागाह चला कुफ़्र का इक तीर-ए-सितमगार
कटने लगे शाने, नहीं हारा वो अलमदार
ली मश्क यूँ दाँतों में कि शाने जो क़लम थे
अब्बास के ख़ैमों की तरफ़ बढ़ते क़दम थे
नागाह लगा मश्क पे इक तीर-ए-सितमगर
बहने लगा पानी, तो बपा हो गया महशर
टूटी जो उम्मीद-ए-हरम-ए-सिब्त-ए-पैयम्बर
बे-दस्त व मददगार गिरा मर्द-ए-दिलावर
गुल था कि जुदा होता है शब्बीर से भाई
अब्बास ने ये रस्म-ए-वफ़ा ख़ूब निभाई!
मंसूर नक़वी

0 टिप्पणियाँ