इस्तकबाल-ए-मुहर्रम - Istaqbal E Muharram Noha
इस्तक़बाल-ए-मुहर्रम
चेहरा है पुर-मलाल मुहर्रम के चाँद का
गहना गया जमाल मुहर्रम के चाँद का
आग़ाज़-ए-साल-ए-नौ का इबारत है ज़ुल्म से
सीना लहू से लाल मुहर्रम के चाँद का
जब सुर्ख़ी-ए-शफ़क़ से लहू-रंग हो फ़लक
होता है एहतिमाल मुहर्रम के चाँद का
बैअत न की हुसैन ने तो सब ने कैसे की
उम्मत से है सवाल मुहर्रम के चाँद का
पानी नहीं था फिर भी लहू के ख़राज से
चेहरा दिया उजाल मुहर्रम के चाँद का
मौला हुसैन ने सर-ए-मक़तल कटा के सर
डर सब दिया निकाल मुहर्रम के चाँद का
हर वक़्त के यज़ीद को ललकारो हक़ के साथ
रुतबा रखो बहाल मुहर्रम के चाँद का
क़ल्ब ओ नज़र को उनके मसाएब ने आ लिया
जब आ गया ख़याल मुहर्रम के चाँद का
इमरान हुसैन पाशा


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