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बेरोजगारी पर शायरी Berojgari Par Shayari बेरोजगारी पर कविता

बेरोजगारी पर शायरी Berojgari Par Shayari बेरोजगारी पर कविता


बेरोजगारी पर शायरी Berojgari Par Shayari बेरोजगारी पर कविता

बेरोजगारी एक अभिशाप : बेरोज़गारी पर शायरी

पूछो ना उनसे हाल जीवन का,
जिनके पास कोई रोजगार नहीं,
मारे-मारे फिरते हैं सड़कों पर,
घर में भी उनका सम्मान नहीं।

रहते हैं सदा वो बुझे बुझे से,
जीवन को बस कंधों पर ढ़ोते हैं,
दिन और रात उनके लिए बराबर,
सबसे छुपकर वो रोते हैं,
मन की व्यथा कहें तो किससे,
इस भीड़ में भी कोई अपना नहीं,
पूछो ना उनसे हाल जीवन का,
जिनके पास कोई रोजगार नहीं।

मन की लालसा मन में ही दबाए,
कुत्सित विचारों से घिरने लगते हैं,
कुंठा, हताशा और निराशाओं के,
जटिल चक्रव्यूह में फंसने लगते हैं,
फिर चलने लगते हैं उस पथ पर,
जिस पथ की कोई दिशा नहीं,
पूछो ना उनसे हाल जीवन का,
जिनके पास कोई रोजगार नहीं।

स्वरचित मौलिक रचना,
रंजना लता,
समस्तीपुर बिहार
9835838926

बेरोजगारी पर शायरी | बेरोज़गारी पर कविता Berozgari Par Shayari

समस्त साहित्य प्रेमी माताओं बहनों और बहनों को हृदयतल से नमन करते हुए बेरोजगारी पर एक रचना का प्रयासः
बेरोजगारी
झुलस रहा है यह मानव आज,
बहुत ही विकट महामारी से।
त्रस्त हुआ आज जीवन सबका,
महज एक ही बेरोजगारी से।।
सरकारें तो आती और जाती हैं,
बेरोजगारी निपटा नहीं पाती हैं।
जनता को केवल मूर्ख बनाकर,
पुनः शासित भी वे हो जाती हैं।।
विपक्ष तो करती विरोध प्रदर्शन,
खोखला विश्वास ही दिलाती हैं।
होतीं जब वे भी सत्ता काबिज,
वे भी तो दिन वही दिखाती हैं।।
किसी को मिलता रोजगार नहीं,
कोई रिश्वत का ही व्यापारी है।
साठ वर्षीय सेवा को नहीं पेंशन,
पाँचवर्षीय सेवा अधिकारी है।।
योग्यता छँटता आरक्षण कारण,
अयोग्य बनता पदाधिकारी है।
योग्यता भटक रहा सड़कों पर,
तो कोई तीन तीन पेंशनधारी हैं।।
दो हजार बीस में आया महामारी,
धरा पर महामारी दो पहले से है।
हर महामारी से जूझ रही जनता,
नेता तो केवल नहले पे दहले से है।।
प्रति नेता को चाहिए पाँच कमाई,
जनता में किसी को तो एक नहीं।
भारतवर्ष का यह न्याय है कैसा,
या स्वार्थांधता में है विवेक नहीं।।
कुछ जाते सबको टाॅफी दिखाकर,
जीत के बाद उसे भी खा जाते हैं।
किन्तु कुछ आते काॅफी दिखाने,
काॅफी बदले टाॅफी भेजवाते हैं।।
टाॅफी तो है केवल स्वाद लेने हेतु,
टाॅफी से पेट कभी भरता नहीं।
काटता वह जीवन आहें भरकर,
पारिवारिक मोह में मरता नहीं।।
बेरोजगारी कारण बढ़ी समस्याएँ,
बेरोजगारी कारण बढ़ते अपराध।
हत्या अपहरण चोरी और डकैती,
इंसानियत छोड़कर लेते हैं साध।।
कोरोना तो एक ईश्वरीय महामारी,
दूजे महामारी बेरोजगारी महंगाई।
तीसरा है पारिवारिक अति गरीबी,
कहाँ से कैसे हो पाएगी भरपाई।।
अरुण दिव्यांश 9504503560


एक बेरोजगार का दर्द : बेरोजगारी शायरी Berojgari Shayari in Hindi

डिग्रियां टंगी दीवार सहारे,
मेरिट का ऐतबार नहीं है,
सजी है अर्थी नौकरियों की,
देश में अब रोज़गार नहीं है।

शमशान हुए बाज़ार यहां सब,
चौपट कारोबार यहां सब,
डॉलर पहुंचा आसमान पर,
रुपया हुआ लाचार यहां सब,
ग्राहक बिन व्यापार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।

चाय से चीनी रूठ गई है,
दाल से रोटी छूट गई है,
साहब खाएं मशरूम की सब्जी,
कमर किसान की टूट गई है,
है खड़ी फसल ख़रीदार नहीं है,
देश में अब रोज़गार नहीं है।

दाम सिलेंडर के दूने हो गए,
कल के हीरो नमूने हो गए,
मेकअप-वेकअप हो गया महंगा,
चाँद से मुखड़े सूने हो गए,
नारी है पर श्रृंगार नही है,
देश मे अब रोज़गार नही है।

साधु-संत व्यापारी हो गए,
व्यापारी घंटा-धारी हो गए,
कैद में आंदोलनकारी हो गए,
सरकार से कोई सरोकार नही है,
युवा मगर लाचार नही है
देश मे अब रोज़गार नही है।
देश मे अब रोज़गार नही है।
एक बेरोजगार का दर्द

बेरोज़गारी पर कविता : हिंदी उर्दू साहित्य संसार

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