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फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा हो मुझ पे मदीना दिखाई दे : नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल

फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा हो मुझ पे मदीना दिखाई दे : नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ

madeena-dikhai-de-naat-e-rasool-maqbool


नात-ए-रसूल-ए-मक़बूल ﷺ


फ़ज़्ल-ए-ख़ुदा हो मुझ पे मदीना दिखाई दे
हूँ बहर-ए-ग़म में मुझ को सफ़ीना दिखाई दे

दिल, दिल नज़र न आए नगीना दिखाई दे
या रब! नगीना दिल में मदीना दिखाई दे

मुमकिन नहीं कि लौट के आ जाए खाली हाथ
रहमत का जब किसी को ख़ज़ीना दिखाई दे

दम हम कभी न तोड़ें मसाइल की भीड़ में
संसार में जो उनका क़रीना दिखाई दे ﷺ

कुछ सूझता नहीं है मदीने की याद में
वो दिन ख़ुदा दिखाए मदीना दिखाई दे

बहर-ए-ग़म-ए-गुनह में नबी का है यूँ ख़याल ﷺ
जैसे कि डूबते को सफ़ीना दिखाई दे

नादिरؔ! हैं जब हुज़ूर शफ़ाअत के वास्ते ﷺ
फिर आसियों को क्यों न मदीना दिखाई दे

नादिर असलूबी — इंडिया


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