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सिख धर्म के 10 गुरुओं के नाम | सिख धर्म के 10 गुरु कौन कौन थे

सिख धर्म के 10 गुरुओं के नाम | सिख धर्म के 10 गुरु कौन कौन थे?

कई बार लोगों के मन में कुछ सवाल उठते रहते हैं जैसे— सिखों के कुल कितने गुरु हैं?, सिख कितने प्रकार के होते हैं?, सिख धर्म का क्या अर्थ है?, सिखों के अंतिम धर्म प्रचारक कौन थे?, सिखों के 9 गुरु कौन थे?, सिखों के पांचवें गुरु कौन थे?, सिखों के आठवें गुरु कौन थे?, सिखों के गुरु कौन थे?, सिखों के तीसरे गुरु कौन थे?, सिखों के 10 गुरु के नाम हिंदी में क्या हैं?, सिखों के सातवें गुरु कौन थे?, सिख धर्म के संस्थापक कौन थे, सिख गुरु शार्ट ट्रिक, सिख गुरु की बलिदानी परंपरा, सिख धर्म का इतिहास PDF, सिख धर्म के नियम वगैरह को जानने की उत्सुकता मन में बनी रहती है लेकिन उन्हें जानकारी नहीं मिल पाती है। इसी को ध्यान में रखते हुए या लेख प्रस्तुत किया जा रहा है जिसमें सिख धर्म से संबंधित सभी गुरुओं के नाम तथा उनके संक्षिप्त जीवन परिचय दिया जा रहा है जो आपके लिए लाभदायक सिद्ध होगा।

गुरु नानक देव Guru Nanak Dev Ji

1. प्रथम गुरु नानक देव जी
गुरु नानक देव जी सिख धर्म के प्रथम गुरु और साथ ही साथ सिख धर्म के प्रवर्तक भी थे। गुरुनानक देव जी का जन्म 15 अप्रैल को सन् 1469 में ‘तलवंडी’ नाम के स्थान पर हुआ था। नानक जी के पिता का नाम श्री कल्यानचंद था और उन्हें मेहता कालू जी के नाम से भी जाना जाता था। गुरु नानक देव जी की माता का नाम तृप्ता था। नानक जी के जन्म के पश्चात तलवंडी का नाम ननकाना साहिब पड़ा। वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान में है। गुरु नानक देव जी का विवाह सुलक्ष्णी नाम की कन्या के साथ हुआ था। नानक देव जी के दो पुत्र श्रीचन्द तथा लक्ष्मीचन्द हुए थे। नानक ने कर्तारपुर में एक नगर बसाया था। वह अब पाकिस्तान में है। यही वह जगह है जहां पर सन् 1539 को गुरु नानक जी का देहांत हुआ था।
सिख धर्म के दस गुरुओं के नाम.webp


गुरु नानक देव जी की प्रथम ‘उदासी’ (विचरण यात्रा ) 1507 ई से 1515 ई तक चलती रही। इस लंबी यात्रा में उन्होंने हरिद्वार, प्रयाग, काशी, अयोध्या,असम, गया, पटना, रामेश्वर, जगन्नाथपुरी, नर्मदातट, सोमनाथ, द्वारका, पुष्कर तीर्थ, बीकानेर, दिल्ली, पानीपत, कुरुक्षेत्र, लाहौर, मुल्तान, वगैरह स्थानों का भ्रमण किया।

गुरु अंगद देव जी Guru Angad Dev Ji

2. गुरु अंगद देव जी
गुरु अंगद देव जी सिख धर्म के दूसरे गुरु थे। गुरु नानक देव जी ने अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था। गुरु अंगद देव का जन्म फिरोजपुर नाम के स्थान पर 31 मार्च, 1504 को हुआ था यह स्थान पंजाब में है। इनके पिता का नाम फेरू जी था। यह एक व्यापारी थे। उनकी माता का नाम माता रामो जी था। गुरु अंगद देव को ‘लहिणा जी’ के नाम से भी पुकारा जाता था। श्री अंगद देव जी पंजाबी लिपि तथा ‘गुरुमुखी’ के जन्मदाता हैं।
गुरु अंगद देव का विवाह खीवी नाम की महिला से हुआ था। इनकी चार संताने हुई थी। जिनमें से दो पुत्र तथा दो पुत्रियां थी। उनके नाम दासू और दातू और दोनों पुत्रियों के नाम अमरो और अनोखी थे। वह लगभग सात सालों तक गुरु नानक देव के साथ-साथ रहे और इसके पश्चात सिख पंथ की गद्दी संभाली। वह सितंबर 1539 से मार्च 1552 तक गद्दी पर आसीन होकर सिख धर्म का पालन और प्रचार प्रसार करते रहे। गुरु अंगद देव जी ने जात पात के भेद भाव से हटकर लंगर प्रथा चलाई तथा पंजाबी भाषा का प्रचार भी शुरू किया।

गुरु अमर दास जी Guru Amar Das Ji

3. गुरु अमर दास जी
गुरु अमर दास जी को गुरु अंगद देव के बाद सिख धर्म का तीसरा गुरु घोषित किया गया। उन्होंने कन्या-हत्या, जाति प्रथा, ऊंच-नीच, और सती प्रथा जैसी निंदनीय कुरीतियों को समाप्त करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। गुरु अमर दास जी का जन्म 23 मई 1479 को अमृतसर में एक गांव में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री तेजभान और माता का नाम लखमी ( लक्ष्मी ) था। उन्होंने 61 वर्ष की आयु में गुरु अंगद देव को अपना गुरु बनाया तथा लगातार 11 वर्षों तक उनकी सेवा में जीवन बिताया। उनकी सेवा, समर्पण और लगन को देखते हुए गुरु अंगद देव ने उन्हें गुरुगद्दी सौंप दी थी। गुरु अमर दास का 1 सितंबर 1574 में स्वर्गवास हो गया।
गुरु अमरदास जी ने सिख धर्म को हिंदू धर्म के अंधविश्वासों और कुरीतियों से छुटकारा दिलाने का काम किया। उन्होंने अंतरजातीय विवाह Interracial Marriage को बढ़ावा देने और विधवाओं के पुनर्विवाह करने की अनुमति दी। उन्होंने सती प्रथा का कठोरता से विरोध किया।

गुरु रामदास जी Guru Ram Das Ji

4. गुरु रामदास जी
गुरु रामदास जी को गुरु अमरदास के बाद गद्दी पर बिठाया गया। वे सिख धर्म के चौथे गुरु हुए। उन्होंने 1574 ई में गुरु पद प्राप्त किया था। इस पद पर वह 1581 ई. तक बने रहे थे। वह सिखों के तीसरे गुरु अमरदास जी के दामाद भी थे। उनका जन्म लाहौर में हुआ था। जब गुरु रामदास किशोरावस्था में थे तो उनकी माता की मृत्यु हो गई थी। लगभग सात साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया था। उसके पश्चात वह अपनी नानी के घर रहने लगे थे। गुरु रामदास जी की नम्रता, निष्ठा, सहनशीलता, और आज्ञाकारिता के भावों को देखते हुए गुरु अमरदास जी ने अपनी छोटी पुत्री का विवाह इनसे कर दी।
गुरु रामदास ने 1577 ईस्वी में ‘अमृत सरोवर’ नाम से एक नगर की स्थापना की थी। जो बाद में चलकर अमृतसर के नाम से प्रसिद्ध हो गया। गुरु रामदास सच्चे साधु स्वभाव के व्यक्ति थे। इस कारण शहंशाह अकबर भी उनका सम्मान किया करता था। गुरु रामदास के कहने पर ही अकबर ने एक वर्ष पंजाब से लगान नहीं लिया था।

गुरु अर्जन देव जी Guru Arjan Dev Ji

5. गुरु अर्जन देव जी
सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव हुए। जिनका जन्म 25 अप्रैल 1563 ईस्वी में हुआ था। वह सिख धर्म के चौथे गुरु श्री राम दास देव जी के पुत्र भी थे। वह 1581 ईस्वी में गद्दी पर बैठे थे। सिख गुरुओं ने अपने प्राणों का बलिदान देते हुए मानवता और धर्म की रक्षा करने की जो परंपरा स्थापित की थी। उनमें सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जुन देव का बलिदान महत्वपूर्ण तथा महान माना जाता है।
उन्होंने ‘अमृत सरोवर’ का निर्माण करवाकर उसमें ‘हरमंदिर साहब’ (स्वर्ण मंदिर ) का निर्माण करवाया जिसकी बुनियाद सूफ़ी संत मियां मीर के हाथों से रखवाई थी। उनका देहांत 30 मई 1606 ई. को हुई थी।

गुरु हरगोबिन्द सिंह जी Guru Har Gobind Sahib Ji

6. गुरु हरगोबिन्द सिंह जी
सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिन्द सिंह जी थे। वह सिखों के पांचवें गुरु श्री अर्जन देव के पुत्र थे। गुरु हरगोबिन्द सिंह ने ही सिखों को अस्त्रों और शस्त्रों का प्रशिक्षण लेने के लिए प्रेरित किया और सिख पंथ को योद्धा चरित्र प्रदान किया। वे स्वयं भी एक क्रांतिकारी योद्धा थे। उनसे पहले सिख पंथ प्रायः सभी गुरु इस प्रकार के चरित्र से रहित तथा निष्क्रिय था। सिख धर्म के पांचवें गुरु अर्जन को फांसी दिए जाने के पश्चात उन्होंने गद्दी संभाली। उन्होंने एक छोटी सी सेना बनाई थी। इससे दुखी होकर क्रुर इस्लामी बादशाह जहांगीर ने उनको 12 वर्षों तक कैद में रख दिया था। क़ैद से रिहा होने के पश्चात उन्होंने शाहजहां के विरुद्ध कठोर बगावत छेड़ थी और 1628 ई. में अमृतसर के पास संग्राम में जहांगीर के शाही फौज को हरा भी दिया। सन् 1644 ई. में कीरतपुर, पंजाब में उनका देहांत हो गया।

गुरु हर राय जी Guru Har Rai Ji

7. गुरु हर राय जी
गुरु हर राय जी सिख धर्म के सातवें गुरु बनाए गए थे। उनका जन्म जनवरी 16, सन् 1630 ई. को पंजाब में हुआ था। गुरु हर राय जी सिख धर्म के छठे गुरु के पुत्र बाबा गुरदिता जी के छोटे पुत्र थे। गुरु हर राय जी का विवाह किशन कौर जी से हुआ था। जिनके दो पुत्र गुरु रामराय जी तथा हरकिशन साहिब जी हुए थे। गुरु हर राय ने मुगल शासक औरंगजेब के भाई दारा शिकोह की विद्रोह में सहायता की थी। गुरु हर राय का देहांत सन् 1661 ई. में हुआ था।

गुरु हरकिशन साहिब जी Guru Har Krishan Ji

8. गुरु हरकिशन साहिब जी
गुरु हरकिशन साहिब को सिखों के आठवें गुरु के रूप में नियुक्त किया गया। 17 जुलाई, 1656 को उनका जन्म किरतपुर साहेब में हुआ था। बहुत छोटी उम्र में उन्हें गद्दी प्राप्त हुई थी। मुगल बादशाह औरंगजेब ने इसका विरोध भी किया था। इस मामले का फैसला करने हेतु उस समय के महाक्रूर शासक औरंगजेब ने गुरु हरकिशन जी को दिल्ली बुलवाया था।
गुरु हरकिशन जब दिल्ली पहुंचे तभी वहां पर हर तरफ हैजे की महामारी फैली हुई थी। वह उन रोगियों की सेवा में जुट गए। कई लोगों को उपचार तथा स्वास्थ्य लाभ दिलाने के बाद उन्हें स्वयं चेचक निकल आई। 09 अप्रैल 1664 को मृत्यु के समय उनके मुंह से ‘बाबा बकाले’ शब्द निकले थे। जिसका अर्थ यह था कि उनका उत्तराधिकारी बकाला गांव में ढूंढा जाए। साथ ही गुरु साहिब ने सभी लोगों को निर्देश भी दिया कि कोई भी उनके देहांत पर रोयेगा नहीं।

गुरु तेग बहादुर सिंह Guru Tegh Bahadur Ji

9. गुरु तेग बहादुर सिंह जी

गुरु तेग बहादुर सिंह सिख धर्म के नौवें गुरु का जन्म 18 अप्रैल, 1621 ईस्वी को पंजाब के अमृतसर नगर में हुआ। वह हमारे नौवें गुरु थे। वह सिख धर्म के छठें गुरु श्री हरगोबिंद सिंह एवं माता नानकी जी के पुत्र थे। गुरु तेग बहादर सिंह ने धर्म की रक्षा तथा धार्मिक स्वतंत्रता को स्थापित करने हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था और सही अर्थों में ‘हिन्द की चादर’ कहलाए थे। उस समय क्रूर और अमानवीय कृत्यों को करने वाले महा-पापी, अत्याचारी और अधर्मी मुगल शासक जबरदस्ती लोगों का धर्म परिवर्तन करवाते जा रहा था। इससे त्रस्त होकर कश्मीरी पंडित गुरु तेग बहादुर के पास त्राहिमाम करते हुए आए और उन्हें बताया कि किस प्रकार अंधविश्वास में जकड़ा हुआ औरंगजेब हम सभी पर इस्लाम को स्वीकार करने के लिए अत्याचार कर रहा है। इसके पश्चात उन्होंने उन पंडितों से कहा कि आप जाकर पापी औरंगजेब से कहिए कि अगर गुरु तेग बहादुर जी ने इस्लाम धर्म ग्रहण कर लिया तो उनके पश्चात हम भी इस्लाम धर्म ग्रहण कर लेंगे और अगर आप गुरु तेग बहादुर जी से इस्लाम धारण नहीं करवा सकें तो हम भी इस्लाम धर्म धारण नहीं करेंगे। औरंगजेब ने इस बात को स्वीकार कर लिया।
गुरु तेग बहादुर जी औरंगजेब के दरबार में गए। औरंगजेब ने उन्हें कई प्रकार के प्रलोभन दिए किंतु गुरु तेग बहादुर जी उस अधर्मी के लालच में नहीं आए और इस्लाम धर्म को क़ुबूल नहीं किया तो उन पर अनगिनत ज़ुल्म किए गए। उन्हें कैद कर दिया गया। उनके दो शिष्यों को मारकर गुरु तेग बहादुर जी को डराने की चेष्टा की गई। पर वह नहीं माने। इसके पश्चात उसने दिल्ली के चांदनी चौक पर गुरु तेग बहादुर जी का शीश काटने का हुक्म दे दिया और गुरु जी ने 24 नवंवर 1675 को सिख धर्म की रक्षा के लिए अपना बलिदान दे दिया।

गुरु गोबिन्द सिंह जी Guru Gobind Singh Ji

10. गुरु गोबिन्द सिंह जी
गुरु गोबिन्द सिंह सिखों के अंतिम और दसवें तथा देहधारी गुरु थे। गुरु गोबिन्द सिंह जी का जन्म 22 दिसंबर 1666 ईस्वी को पटना में हुआ था। वह नौवें परम आदरणीय श्री गुरु तेग बहादुर जी के प्रिय पुत्र थे। उनको मात्र 9 वर्ष की आयु में गुरुगद्दी मिली थी। गुरु गोबिन्द सिंह के जन्म के समय भारत पर मुग़ल बादशाह का शासन था।
गुरु गोबिन्द सिंह ने भारत की संस्कृति धर्म तथा राष्ट्र की आन-बान और शान की रक्षा करने के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। उनके बड़े पुत्र बाबा श्री अजीत सिंह तथा एक और पुत्र बाबा श्री जुझार सिंह ने चमकौर की लड़ाई में शहादत प्राप्त की। जबकि दो छोटे बेटों में बाबा जोरावर सिंह तथा फतेह सिंह को उस समय के नवाब ने जिंदा दीवारों में चुनवा दिया था। बाद में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने गुरु प्रथा को सदा के लिए समाप्त कर के गुरु ग्रंथ साहिब को ही एकमात्र गुरु मान लिया था।
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