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हास्य कविता हिंदी हास्य व्यंग्य शायरी Hasya Vyang Kavita Funny Shayari

पहली बार ससुराल गया : ससुराल पर हास्य व्यंग कविता Funny Shayari Hindi
हास्य कविता

भटके राही
पहली बार ससुराल गया
हाथ मिठाई डिब्बा लिया।
मोटर गाड़ी टमटम नहीं
पल-पल डैग चला सही।
मैं राही गुमसुम एक था
टोकता हमको अनेक था।
मुश्किल डगर हैं गाँव चले
पाँव लागातार हाँ बढ़े।
थी असीम खुशी साथ अभी
मिले लोग अंजाना सभी।
वक्त शादी तरह द्वार था
चारो ओर सिर्फ प्यार था।
तब किसी को पुकारा नहीं
बुद्धि प्रियतम सहारा तभी।
सामने कुर्सी पड़ी दिखी
बस चीज कतिपय दिखी लिखी।
कदाचित लिखा वह नाम था
किन्तु समझ का रे काम था।
मैं तो उत्साह विभोर था
आया जो मेरे ओर था।
पूछा अजी आप कौन हैं?
गुमसुम बैठे क्यों मौन हैं।
मैं आया पहली बार हूँ
शर्मोहया के शिकार हूँ।
रखें मिठाई पैकैट अब
दिखे तभी प्रियशी गेट जब।
अपनी जैसी से दूर थी
वह लेने को मजबूर थी।
दौड़ी-दौड़ी वह घर गई
सूरत मेरी रे कह गई।
लगता नहीं प्रिये हैं वही
अंजाना टपके हैं अभी।
बैचेन घर के अंदर था
ताक-झांक के समंदर था।
कोई बोला वह है नहीं
आकर वही बात थी कही।
पल में ही सपने चूर था
झट जाने को मजबूर था।
धन्यवाद।
प्रभाकर सिंह
नवगछिया, भागलपुर
बिहार

मैं प्यार का दिवाला हूँ। Funny Love Shayari Funny Romantic Shayari

हास्य कविता(छंद मुक्त)
हाँ! मैं प्यार का दिवाला हूँ।
एक बार कुटुम्ब के यहाँ गया
भोज का भरपूर आनंद लिया।
खाकर वहीं तभी लेट गया
सोये महानुभाव सामने पेट दिया।
वे बोले ऐसे क्यों सोते हो?
जरा हटो!तुम कितना मोटे हो?
मैंने कहा-
महानुभाव अभी-अभी खाया हूँ।
चलकर बहुत दूर से आया हूँ।
अजी थोड़ा आप ही हट जाईये।
नावागन्तुक हूँ,सत्कार दिखाईये।
वे बोले मैं भी तो एक गेस्ट हूँ।
तुमसे कहीं ज्यादा बेस्ट हूँ।
मैंने कहा-
अच्छा तो सो जाईये।
वर्चस्व खुद के मत दिखाईये।
बेचारे!झट से सो गये
उसी ओर हम भी हो लिये।
आई नींद तभी आया सपना था।
आनंद ही आनंद अपना था।
उसने मेरे हाथ मरोड़े थे
नींद मेरी नींद झट तोड़े थे।
आप यह क्या कर दिये?
मेरे सपने भंग कर दिये?
बोला।तुम्हारे हाथ पाँच के नोट है
बिल्कुल जेबकतरे जैसे ही चोट है।
तुमने मेरे जेब में हाथ डाला है?
अभी-अभी नोट निकाला है।
मैंने कहा-
अजी क्या बकते हो?
अनाप-शनाप जपते हो।
मैं आपके जेब क्यों हाथ डालूँ?
अजी नोट-वोट क्यों निकालूँ?
भरपूर नींद से सोया था।
प्रिये की याद में खोया था।
पत्र उन्होंने ही भेजी थी।
शायद जेब में ही सहेजी थी।
नोट पत्र समझकर निकाला हूँ
हाँ।मैं प्यार का दिवाला हूँ।
धन्यवाद।
प्रभाकर सिंह
नवगछिया, भागलपुर
बिहार

जनसंख्या कानून पर हास्य-व्यंग्य कविता

हास्य कविता
जनसंख्या कानून
कितने नेता देखो भैया
बहुत-बहुत हुए अब उदास।
दो से दो है ज्यादा बच्चें
क्षीण हुई कुर्सी की आस।
जनसंख्या कानून कवायद
दो वालों में उमंग जोश।
यह कानून भी कानून रे
कुँवारे जी को कहाँ होश?
कानून पे कानून कैसा?
गत दिनों मजनूँ होशियार।
कल्पना तक नहीं करते अब
कैसे करूँ अभी मैं(मजनूँ) प्यार।
नेतागीरी में उम्र बिती
अब क्या करे वह! बदहवास।
बच्चे-बच्चे कहकर चौकें
गिनती में घटबढ़ की आस।
धन्यवाद।
प्रभाकर सिंह
नवगछिया, भागलपुर
(बिहार)

मेरी शवयात्रा: हास्य कविता हिंदी, हास्य व्यंग्य शायरी Hasya Vyang Kavita

मेरी शवयात्रा
एक बार मैं भी मरने का नाटक किया।
आँखे बंद की ह्रदय गति रोक लिया।।
देखते ही मेहरारु जोर जोर से चिल्लाई।
छोड़ कर चला गया बेदर्दी कसाई।।
वो रो रही थी या गरिया रही थी।
क्लेजा पीटकर लोगो को बुला रही थी।।
सुनते ही गांव गली के लोग आ गए।
कल तो ठीक था कैसे सिधार गए।।
बेटा नाक तो कभी क्लेजा छू रहा था।
मैं सांस रोके था मेरा दम घुंट रहा था।।
एक ने बोला देह काला पर गया है।
दुसरा, शायद जहर निगल गया है।।
तीसरा हो सकता है कल उदास था।
आज भी मुंह बनाए बदहवास था।।
गाँव वाले तो सब वकील लग रहे थे।
सब अपनी अपनी दलील दे रहे थे।।
मैं सचमुच में ही मरा जा रहा था।
ये नाटक मन ही मन रुला रहा था।।
पहली बार जो मरने की नाटक की थी।
सूबह से पानी भी नहीं पी थी।।
पडोस के काका भी देखने आए।
मेरे मरने पर भी खूब सूनाए।।
बड़ा कम्बख्त था जहर खा लिया।
मैं इसका शक्ल न देखूँ मुंह बना लिया।।
अरे इसके लाश से तो महक आती है।
कहा़ँ गई पतोहू काहे आंसू बहाती है।।
मत रोओ वरना थाना पुलिस आ जाएगी।
ये ससुरा तो गया आफत तुम पर आएगी।।
मैं तो गुस्से से तब लाल हो रहा था।
लात मारुंँ क्या पर संभाल रहा था।।
पतोहू संदूक की ताला तोड़ रही थी।
कोने में पाई पाई हिसाब जोड़ रही थी।।
चार मुंछदंदे कंधा देने को तैयार थे।
हम भी पुरी तरह से होशियार थे।
उठाकर अर्थी पर हमें पटक दिया।
मोटी रस्सी लेकर जोर से जकड़ दिया।।
चारो ने मुझे कांधे पर उठाया।
आगे वाले ने कुछ फुसफुसाया।।
बेटा अंदर ही अंदर खूश था।
आजादी मिली पापा भारी कंजूस था।।
अच्छा होता मैं सच में मर जाता।
आप भी मेरी जगह होते क्लेजा फट जाता।।
दुष्टों ने बड़े कस के बांध रखी थी।
सचमुच कब्र में मेरी टांग अटकी थी।
फिर एक ने बोला इसका घर कैसे चलेगा।
अभी जवान था ये भूत प्रेत ही बनेगा।।
मुझसे रहा न गया जोर की साँस ली।
सारे अपने थे सबको पहचान ली।।
मुझे जोर से पेशाब लगा हुआ था।
पर पुरा बदन बंधा हुआ था।।
जो भी हो तभी मेरी बादशाही थी।
जनाजा ही सही मगर शाही थी।।
आज आया था उंट पहाड़ के नीचे।
ऊपर मैं था बाकी सब थे नीचे।।
रोने वालों में एक मेरी माँ ही थी।
मानो सचमुच अधमरी जां सी थी।।
मुझे भी उसका रोना सता रहा था।
मेरा कर्तव्य मुझे बुला रहा था।।
बेटा बोला इसे कहाँ ले जाएंगे।
बारिश की रात है कैसे जलाऐंगे।।
खखनुआं बोला जोर से खाँस कर।
कहा़ँ ले जाएंगे ले चलो बांध पर।
मुखबती लगाकर पानी में बहा देंगे।
नही तो बेर बबूल से जला देंगे।।
मैं सब कान लगाए सुन रहा था।
अपने उपकारों को गिन रहा था।।
क्या नहीं किया इन लोगों के लिए।
कैसे कैसे मुसीबत में भी साथ जिए।।
मैने तो सिर्फ एक नाटक किया था।
ऐसा कड़वा घुंट कभी न पिया था।
मन ही मन हम भी गरिया रहे थे।
अपने हालात पे मुस्कुरा रहे थे।।
आखिर में वो बांध भी आ गया।
बारिश भी अपना रंग जमा गया।।
कलमुंहें को आज ही मरना था।
उपर से झर रहा आसमानी झरना था।
मुझे भी मौका मिला पेशाब करदी।
बारिश के कारण लग रही थी सर्दी।।
न आव देखा न ताव छींक डाला।
बेबकुफों को पड़ा था हमसे पाला।।
उसी वक्त बिजली भी कडकी।
चारो की साँस अचानक धड़की।।
आगे पुलिस का सीटी बज रहा था।
चारो को बारिश में पसीना बह रहा था।।
हाय राम ये मुर्दा कितना भारी है।
कौन छींका किसकी मति मारी है।।
सबके सब बेचैन थे बस मैं खुश था।
एक दो लोगों को भारी दुख था।।
कुछ लेन देन का हिसाब बाकी था।
मूल धन समेत ब्याज बाकी था।।
मेरे मौत पे नहीं अपने बेमानी का शोक था।
इसीलिए उन्हें बड़ा अफसोस था।।
मेरे बीबी से भी ज्यादा वो रोया।
तीन सौ रुपया जो उसने खोया।।
कल ही दिया था भाई से चुराकर।
छह रुपए सैकड़ा ब्याज बताकर।।
यही गम उसे खाए जा रहा था।
उसे खूब रुलाए जा रहा था।।
सारा का सारा आदमी त्रस्त था।
राम कसम मै बिल्कुल मस्त था।।
तब तक सामने चौकीदार चिल्लाया।
सुनते ही सभी वहाँ घबराया।।
आगे वाला जोर से फिसल गया।
पीछे वाला भी पुरा डर गया।।
हुआ यूं जनाजा लिए ही गिर गए।
मेरे अच्छे दिन फिर गए।।
बदन से रस्सी खुल गया।
चोट मुझे भी लगी मरने का नाटक भूल गया।।
चौकीदार चुप दारोगा जोर से बोला।
बताओ कैसे मरा थाने आकर क्यों नहीं बोला।।
पहले इस पर एफ आई आर होगा।
सुना हूँ जहर खाया है कौन जिम्मेदार होगा।।
कह देता हूँ सबको जेल जाना होगा।
नहीं तो साफ-साफ बताना होगा।।
अगहनुंआ ! छोड़ो ना हाकिम ले दे लेते हैं।
गरीब है मामला निपटा देते हैं।।
गाँव का चौकीदार था शरियत निभा रहा था।
दरोगा को दस बीस हजार सूंघा रहा था।।
वो सब बात में फँसे हुए थे।
हम भी भागने के फिराक में लगे हुए थे।।
जैसे तैसे मैं बंधन से मुक्त हुआ।
श्मशान के पास था गहरा कुंआ।।
बड़े चालाकी से मैंने छलांग लगाई।
अजीबोगरीब आवाज लगाई।।
एक ने बोला मुर्दा कहाँ है।
दुसरा बोला जहाँ था वहाँ है।।
फिर एक ने बोला लाश नहीं है।
मुझसे रहा न गया बोले यहीं हैं।।
मैं सचमुच पीपल का भूत बन गया।
इन लोगों के लिए यमदूत बन गया।।
तब तक कड़ाके की बिजली गिरी।
दारोगा की लाल टोपी उड़ी।।
लोग मुझे इधर उधर खोजने लगे।
हम भी घर की तरफ भागने लगे।।
पीछे वाली किवाड़ से घर में आया।
माँ-माँ तुम कहाँ हो मैं लौट आया।।
मुझे देखकर माँ भी थोड़ी घबराई।
फिर दौड़ कर मेरे पास आई।।
मेरे लाल तुझे क्या हुआ था।
कुछ नहीं यमराज ने छुआ था।।
स्वर्ग की सैर करके आया हूँ।
तेरी याद आई इस लिए चला आया हूँ।।
बहू को बुलाओ उसे भी ले जाएंगे।
इस बार श्मशान नहीं सीधा स्वर्ग जाएंगे।।
तुमसे बहुत झगड़ा करती है।
बात बात में लड़ती झगरती है।।
इतना सुनते ही बहू भागने लगी।
जोर जोर से परोसी को पुकारने लगी।।
बचाओ मेरा पति लौट आया है।
उस पर भूत प्रेत का साया है।।
चारो तरफ भगदड़ मची हुई थी।
अंधेरी रात कट गई थी।।
मैं हाथ जोड़ खड़ा हो गया।
भाईयों अब मैं जिंदा हो गया।।
अभी अभी स्वर्ग से आया हूँ।
सीधा आसमाँ से धरती पे आया हूँ।।
सच में बहुत मजा आया।
तुम्हारी याद में स्वर्ग से चला आया।
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उदय शंकर चौधरी नादान
कोलहंटा पटोरी दरभंगा
7738559421

साहित्य के नाम देखलो कविता का व्यापार हुआ : साहित्य और समाज पर व्यंग्य

बस यूं हीं एक व्यंग
साहित्य के नाम देखलो कविता का व्यापार हुआ।
खोले निजी संस्थान नित्य नया रोजगार हुआ।।

खाते में पैसा भेजो और तीन पृष्ठ छपवा लो जी।
रकम नहीं है ज्यादा साझा संकलन करा लो जी।।

फूलों के इक हार चढ़ेंगे सम्मान मिल जाएंगे।
कविताई की दुनिया में जी नाम तेरे हो जाएंगे।।

पीट कलेजा फिर कहना ये सम्मान मैं पाया हूंँ।
अखबार में आया है जी ये मैडल मैं पाया हूँ।।

बिकते हैं सम्मान यहाँ पर और खरीदें जाते हैं।
काट छांट कर कविता में सेंध लगाए जाते हैं।।

अश्लीलता फुहड़ता के बीच में कविता रोती है।
कवियों की गुटबंदी भी भार सहज ये ढोती है।।

शब्दों के सागर में देखो बड़े बड़े कंगाल हुए।
नटवरलाल बने कितने कई खेसारीलाल हुए।।

हास्य जरुरी है प्यारे पर उसमें भी मर्यादा हो।
सीमा के अंदर हो सब सीमा से न ज्यादा हो।।

साहित्य दर्पण है पहले अपना चेहरा देखो जी।
भला समाज का हो ऐसा कुछ तो लिखो जी।।
उदय शंकर चौधरी नादान
9934775009
मेरी शवयात्रा: हास्य कविता हिंदी फोटो - Funny Shayari Image

हिन्दी | उर्दू | साहित्य | संसार

हास्य व्यंग्य कविता: रुपवती गुणवती एक श्रीमती चाहिये

चाहिये
काली नहीं, कलुटी नहीं,
मोटी नहीं, नाटी नहीं,
हमको तो रुपवती गुणवती,
एक श्रीमती चाहिये।
काली नहीं कलुटी नहीं...।
ससुर मेरा धनवान,
सास मेरी गुणवान,
शाला की कोई चाह नहीं,
शाली दो चार चाहिये।
काली नहीं,कलुटी नहीं...।
रुपया नहीं,पैसा नहीं,
धन नहीं,दौलत नहीं,
हमको तो टीवी,फ्रीज,गोदरेज,
एक मोटरकार चाहिये।
काली नहीं,कलुटी नहीं...।
गर कोई ऐसा परिवार मिले,
पत्नी का प्यार मिले,
शीध्र हीं मुझे,
उसका पत्ता बतलाईये।
काली नहीं,कलुटी नहीं...।
बताने वाले को उचित कमीशन,
इज्जत और शोहरत मिशन,
गर कोई मुल्ला हो,
उनको यहाँ लाईये।
काली नहीं,कलुटी नहीं...।
अरविन्द अकेला
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