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हिजाब शायरी Hijab Shayari नकाब शायरी Naqaab Shayari हिजाब पर कविता

हिजाब पर कविता, हिजाब पर शायरी चेहरे पर नकाब शायरी

Shayari For Hijab Girl

हिजाब शायरी Hijab Shayari नकाब शायरी Naqaab Shayari हिजाब पर कविता

हिजाब औ भगवा
विद्या के सुंदर पवित्र आलय में,
यह हिन्दू और मुसलमान कहाँ।
जहाँ विराजित श्वेतवस्त्र तिरंगा,
हिजाब भगवा का स्थान कहाँ।।
विद्या की इस अविरल धारा को,
यों ही निरंतर प्रवाहित होने दो।
मत उत्पन्न करो तुम ज्वार भाटा,
छात्र छात्राओं को इसमें खोने दो।।
जहाँ विराजें शारदे भारत माता,
अल्लाह और ईश कहाँ से आए।
सबके मन में आग भड़का कर,
जाति धर्म जबरन आग लगाए।।
छात्र भैया बहनें होतीं सुंदर पावन,
छल प्रपंच नहीं जिनमें हैं जिन्दा।
उनके दिल में भी आग लगाकर,
राष्ट्र को क्यों कर रहे शर्मिन्दा।।
तुझे राष्ट्रभक्त कहूँ या राष्ट्रद्रोही,
राष्ट्र विरक्ति कहूँ या राष्ट्र छोही।
हिन्दू मुस्लिम का विवाद लेकर,
क्यों बन बैठे हो कट्टर निर्मोही।।
सबको होती ज्ञान की जरूरत,
आलय सबको महान है बनाता।
तुम्हारे जैसे ही तुम्हारे जैसे को,
ज्ञानहीन और हैवान है बनाता।।
विद्या की पावन पवित्र धारा में,
इन्हें गोते भी तुम खूब लगाने दो।
 डूब सकें वे जितनी गहराई में,
पूरी इच्छा भर इन्हें डूब जाने दो।।
होती नहीं मौत इस महासागर में,
नहीं हो पाता इसमें कोई बेहोश।
जो जितना अधिक डुबकी लगाए,
उसका उतना ही बढ़ता है जोश।।
आलय में हिजाब भगवा है क्या,
विद्यालयी पोशाक में ही रहने दो।
विद्यालय का निजी होता कानून,
उसी कानून में उसे भी बहने दो।।
आलय में राजनीति मत घुसाओ,
आलय की पवित्रता दिल बसाओ।
अरुण दिव्यांश कर जोड़ी विनती,
सुंदर शिक्षित भारतीय बन जाओ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना।
अरुण दिव्यांश‌9504503560


हिजाब पर शायरी Hijab Shayari : कभी जीन्स तो कभी हिजाब

कभी जीन्स तो कभी हिजाब
कभी जीन्स तो कभी हिजाब पे, पाबन्दी लगाई जाती है।
ये सारी योजनाएँ, सिर्फ़ नारियों के लिए बनाई जाती है।

आख़िर कब तक, हम सब पे ये पाबन्दी लगाई जाएगी।
कभी हजूम में तो कभी अकेले में, दुत्कार लगाई जाएगी।

कभी तो हमें भी अपनी मर्ज़ी के मुताबिक, जीने दिया जाए
बहुत हो चुका ये तमाशा, तमाशे को अब बन्द किया जाए।

जीन्स पहनने देना है या नहीं, हिजाब पहनने देना है या नहीं
इतना ज़रा बता दो, हमें इस दुनिया में जीने देना है या नहीं।

हम लक्ष्मी, हम दुर्गा, हम फ़ातिमा, मरियम भी हम।
हमें न सिखाओ सहनशीलता, हमने तुम्हें दिया जन्म।

बात कड़वी है, तो अपनी दकियानूसी बातों से बाज़ आ जाओ
हमें उलझा कर इन सब में, अपना नया रास्ता न बनाओ।

राजनीति के खेल में, हमेशा हमें खिलौना बनाया जाता है।
कभी लगा लेते हैं गले, तो कभी हमें वैश्या बताया जाता है।

चार दिवारी से हमारा निकलना , क्या तुम्हें भाता नहीं।
हम में तुम में फ़र्क़ नहीं, ये बात तुम्हारी समझ में आता नहीं

जिस दिन हम हक़ की ख़ातिर, चंडी और काली बन जाएँगे।
याद रखना उसके बाद सिर्फ़ हम ही तुम्हें याद आएँगे।
याद रखना उसके बाद सिर्फ़ हम ही तुम्हें याद आएँगे।
नीलोफ़र फ़ारूक़ी तौसीफ़
मुंबई
©Nilofar Farooqui Tauseef
Fb, ig-writernilofar


हिजाब पर कविता : जीने दो सभी को यहां

जीने दो सभी को यहां
(मनहरण घनाक्षरी काव्य)
भिन्न-भिन्न जाति धर्म,
अलग है सबका कर्म,
न्यारी संस्कृति हमारी,
ऐसी ही खिलती रहें।

हम सबकी एकता,
बनी रहे वो समता,
अशांति ना फैलें यहां,
यही मानवता कहें।

जीने दो सभी को यहां,
हम सबका है जहां,
मन में है भाईचारा,
हर कोई प्रेम चाहें।

खेल नया ना करना,
सभी धर्मों का कहना,
कुछ बदलेगा नहीं,
अलग ना हो ये बाहें।

प्रा.गायकवाड विलास.
मिलिंद महाविद्यालय लातूर.
9730661640
महाराष्ट्र


हिजाब पर शायरी गजल Hijab Shayari

गज़ल
हिजाब को अजाब मत बना औरत का सरमाया है।
 आदमी की दरिदंगी ने औरत को बहुत सताया है।।

कुछ बातों को मजहब की समझा कर फिर बोलाकर।
सूरज की तपन हिजाब ने त्वचा नारी की बचाया है।।

कोविड में पर्दा डालकर कई जानें बची की नहीं।
इसीलिए ये हिजाब जिस्म पर औरत ने सजाया है।।

किसी के पीछे सियासत दा इतना ना पढ़ों जुल्म लगे।
अजमत मां बहनों के इस हिजाब ने ही हंसाया है।।

बुनकरों मिला रोजगार बाजार में सजी दुकाने।
सदियों से इस तिजारत ने कई शिकम जगाया है।।

दर्जीयों को मिला काम बेकारी दूर हुई कुछ तो कम।
हर हिसाब से हिजाब दुनिया के वजूद मे आया है।।

'शहज़ाद ' मत करों खत्म भारत की अमन शांती को।
समझदार समझ बात को क्यों ये आग लगाया है।।

मजीदबेग मुगल 'शहज़ाद '
हिगनघाट जि,वर्धा,महाराष्ट्र
8339309229


पर्दा क्यों ? पर्दा पर शायरी घूँघट नकाब हिजाब पर शायरी

पर्दा क्यों ?
पर्दा घूँघट नकाब क्यों ?
पुरुष प्रधान समाज की सोच
उसने माना है
नारी को सिर्फ एक शरीर
भोग की वस्तु
उसके तन का मालिक।

कामी पुरुष ने नाम दिया
धर्म, मजहब, संस्कार, शर्म, हया
और न जाने क्या ?
नारी को इंसान कहाँ माना
परदे में रख कर भी
सजाए बाजार- मंडियाँ
और बेशर्मी से लगाई बोली
जैसे हो कोई बेजान वस्तु।

कभी अपहरण, बलात्कार, अत्याचार
और जिन्दा भी जला दिया
कभी जिन्दा गाढ़ दिया
या गर्भ में मार दिया
वासना की लिए बहा दी
खून की नदियाँ
जैसे नारी होना है कोई अभिशाप है।

चाहा कहाँ ?
नारी सशक्त -शिक्षित हो
आत्मनिर्भर -स्वाभिमानी
वीरांगना, विदुषी साहसी हो
बना दिया उसे कमजोर
कभी डरा कर
कभी समझाकर
ढक दिया परदे में।

किसको बचाया है परदे ने ?
राक्षसी सोच ने
नहीं छोड़ा है
छ माह की बच्ची मासूम को
और अस्सी साल की दादी -नानी को।

सावधान हे महिषासुर पुरुष
नारी महाकाली भी है
झांसी की रानी, मीरा, मैत्रियी, हजरत महल
हाड़ी रानी, झलकारी बाई, अहिल्या बाई
सिंधु, सायना, इंदिरा, अल्वा, भंडारनायके
थैचर, गोल्डा मायर, कल्पना, सानिया व
लता भी है।

मत करों कोशिश जंजीरों में बांधने की
आज नारी आंधी -तूफान भी है
आजाद पंछी
एक सच्ची इंसान भी है।
श्याम मठपाल, उदयपुर
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