तू हाकिम है ज़बर को ज़ेर कह दे : ग़ज़ल – प्रेमनाथ बिस्मिल
ग़ज़ल
(उर्दू से हिंदी लिप्यंतरण)
तू हाकिम है ज़बर को ज़ेर कह दे
किसी गीदड़ को भी तू शेर कह दे
घटाएँ छा रही ज़ुल्म-ओ-सितम की
मगर हिम्मत किसे अंधेर कह दे
तिरी हर बात माने वो भला है
न माने कर दे उसको ढेर कह दे
अभागा तू नहीं वो लोग हैं जो
तिरी तुक-बंदियों को शेर कह दे
मैं आधी रात दफ़्तर आ गया हूँ
तू चाहे तो अभी भी देर कह दे
तअज्जुब तू न कर बिस्मिल अगर वो
ज़मीं मंदिर की है अजमेर कह दे
प्रेमनाथ बिस्मिल
मुरादपुर, महुआ, वैशाली, बिहार
8294170464


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