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हूल दिवस क्या है | हूल दिवस क्यों मनाया जाता है | हूल दिवस पर निबंध

हूल क्रांति क्या है? हुल दिवस कब मनाया जाता है? हूल दिवस क्यों मनाया जाता है

Hul Diwas : 30 जून 2023 को संताल हूल दिवस मनाया जाता है। इसे हूल क्रांति या फिर संथाल विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है। आदिवासी इस दिन को विशेष रूप से अपने संघर्ष और अंग्रेजों के द्वारा मारे गए अपने 20000 साथियों और परिवारजनों की याद में मनाते हैं। जैसा कि नाम से स्पष्ट हो रहा है कि यह विद्रोह आदिवासियों की संघर्ष गाथा और उनके बलिदान को आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के पसीने बहाने वाले शूरवीरों को याद करने का विशेष दिन है। इस दिन को पूरे झारखंड राज्य में रण बांकुरे सिद्धो-कान्हो और चांद-भैरव को याद करते हुए अंग्रेजी हुकूमत के विरुद्ध विद्रोह के प्रतीक के रूप में हूल दिवस मनाया जा रहा है। संथाल की पुण्यभूमि से हूल का शंखनाद अन्याय और दासता से मुक्ति की विजयगाथा। उन नायकों का पवित्र स्मरण आज भी हम सबों का मार्गदर्शन करता रहेगा।


हूल दिवस क्यों मनाया जाता है?

हूल शब्द संथाली भाषा से लिया गया है जिसका अर्थ होता है विद्रोह। 30 जून, 1855 को झारखंड के आदिवासियों ने अंग्रेजी हुकूमत के अत्याचार के विरोध में पहली बार विद्रोह का आरंभ किया। इस दिन 400 गांवों के 50000 लोगों ने साहिबगंज के भोगनाडीह गांव पहुंचकर अंग्रेजों से आमने-सामने की लड़ाई की घोषणा कर दी। आदिवासी भाइयों सिद्धो-कान्हो और चांद-भैरव की अगुआई में तब संथालों ने मालगुजारी नहीं देने और अंग्रेज हमारी माटी छोड़ो का नारा जोर-शोर से बुलंद किया। अंग्रेजों ने तब संथाल विद्रोहियों से परेशान होकर उनका दमन करना शुरू किया। इसकी प्रतिक्रिया में आदिवासियों ने अंग्रेजी सरकार की ओर से आए जमींदारों और सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। तब विद्रोहियों को सबक सिखाने के लिए अंग्रेजों ने क्रूरता की सारी हदें पार कर दीं। चांद और भैरव को अंग्रेजों ने मार डाला। इसके बाद सिद्धो और कान्हो को भोगनाडीह में ही पेड़ से लटकाकर 26 जुलाई 1855 को फांसी दे दी गई। संथाल की माटी के इन्हीं शहीदों की याद में हर साल 30 जून को हूल दिवस मनाया जाता है। एक अंग्रेज इतिहासकार हंटर ने लिखा है कि इस महान क्रांति में लगभग 20000 आदिवासियों को मौत के घाट उतार दिया गया। हालांकि संथालों के इस बलिदान पर कोई भी अंग्रेज सिपाही ऐसा नहीं मिला, जो शर्मिंदा न हुआ हो।


आदिवासियों की जमीन की रक्षा के लिए बनाया गया विशेष बंदोबस्त अधिनियम

जनवरी 1856 में जब हूल क्रांति समाप्त हुआ तब इस इलाके को संथाल परगना का नाम दिया गया। जिसका मुख्यालय दुमका बनाया गया। हूल क्रांति के 44 वर्ष उपरांत वर्ष 1900 मे मैक पेरहांस कमेटी ने आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा के लिए एक बंदोबस्त अधिनियम बनाया। इस अधिनियम की यह विशेषता रही कि इसमें प्रावधान किया गया कि आदिवासीयों की जमीन, कोई दूसरा आदिवासी ही खरीद सकता है। खरीदने और बेचने वालों के घर एक ही इलाके में होना चाहिए। झारखंड में आदिवासी जमीन का हस्तांतरण आज भी इन शर्तों को पूरा करने के पश्चात ही करने का प्रावधान है। 1949 में पारित संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम में 1900 के बंदोबस्ती नियम को जोड़ा गया है, जो आज भी पूरे प्रदेश में लागू है।


बेहद असरदार विद्रोह था हूल क्रांति

वैसे तो 1857 के सिपाही विद्रोह को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का पहला विद्रोह माना जाता है परन्तु संथाल के आदिवासियों का हूल विद्रोह भी काफी असरदार रहा था। तब संथाल विद्रोह मुट्ठी भर आदिवासियों ने शुरू किया जो बाद में एक बहुत बड़ा जन आंदोलन का रूप ले लिया। संथालियों ने अपने परंपरागत हथियारों के दम पर ही अंग्रेजी सेना को हरा दिया था। 1855 के संथाल विद्रोह में 50000 से अधिक लोगों ने अंग्रेजों हमारी माटी छोड़ो का नारा बुलंद किया था।


हूल क्रांति का प्रतिफल है संथाल परगना

हूल क्रांति से पूर्व बंगाल प्रेसिडेंसी के अंतर्गत आने वाला यह क्षेत्र अति दुर्गम और दुरुह था। जहां पहाड़ों और घने जंगलों के कारण दिन में भी आना-जाना बेहद मुश्किल काम था। यहीं से आदिवासियों ने विद्रोह का आह्वान किया था। वर्तमान में संथाल परगना के नाम से जाना जाने वाला यह क्षेत्र पहाड़ की तलहटी में रहने वाले पहाड़िया समुदाय बहुल था। यहां के लोग तब जंगल झाड़ियों को काटकर खेती लायक जमीन बनाते और उसे अपनी जमीन समझते थे। ये लोग अपनी जमीन की मालगुजारी किसी को नहीं देते। जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी के जमींदार उनसे जबरदस्ती लगान वसूली करते थे। पहाड़िया लोगों को सेठ-साहूकार से कर्ज लेना पड़ता था। अत्याचार इतना ज्यादा बढ़ गया था कि आदिवासियों ने संथाल विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। इस इलाके में रहने वाले आदिवासी समुदाय को संथाल के नाम से जाना जाता है। वे बोंगा देवता की पूजा-अर्चना करते हैं जिनके हाथ में बीस अंगुलियां होती हैं। ऐसी मान्यता है कि बोंगा देवता के कहने पर ही भोगनाडीह गांव के चुन्नी मांडी के चार बेटे सिद्धो, कान्हो, चांद और भैरव ने मालगुजारी और अंग्रेजों के अत्याचार के खिलाफ 30 जून 1855 को संथाल में डुगडुगी पीटकर विद्रोह का एलान किया था।


संथालियों ने दारोगा और 9 सिपाहियों को मार डाला था

मंगल पांडे के नेतृत्व वाले 1857 के गदर से दो साल पहले संथाल में विद्रोह का नारा बुलंद हो गया था। विद्रोह के नायक सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव चार भाई थे। ब्रिटिश शासन, जमींदार, महाजन, बनिया तथा साहूकार की शोषण नीति के विरुद्ध आदिवासियों की विस्तृत गोलबंदी हुई। अंग्रेजी हुकूमत कर्ज अदा नहीं करने पर पूरे परिवार को बंधुआ मजदूर बना लेती। मालगुजारी नहीं देने पर उनकी जमीन नीलाम कर दी जाती थी। तब अंग्रेजों को रेलवे लाइन बिछाने के लिए अधिकाधिक जमीन और बड़ी संख्या में मजदूर की जरूरत थी। बंगाल के उपराज्यपाल की मीटिंग का विवरण दिनांक 12 सितंबर 1855 को लिखा गया था। जिसमें संथाल विद्रोह के बारे में बताया गया है। उसके कुछ अंश इस प्रकार हैं :

“मुझे राजमहल रेलवे लाइन के ठेकेदारों से ऐसा आग्रह मिला है कि संथाल विद्रोह के दौरान बाधित रेल कार्यों को फिर से शुरू करना होगा। संथालों, आदिवासियों को निशस्त्र करने की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया गया है। चूंकि, संथालों का युद्ध, कुल्हाड़ी, तलवारें और स्टील की नोक वाले तीर-धनुष से लड़ा जा रहा था, इसलिए उनसे ये वापस लिया जाना चाहिए”


सिद्धो को 30 जून 1855 को भोगनाडीह गांव में 10000 लोगों की सभा में राजा बनाया गया। कान्हू को मंत्री, चांद को प्रशासक और भैरव को आदिवासियों ने सेनापति बनाया। अंग्रेजी राज गया और अपना राज कायम हुआ की घोषणा की गई। इसके बाद अंग्रेजी सरकार को मालगुजारी देना बंद हो गया। फिर 7 जुलाई 1855 को संथाली वीरों ने दमनकारी दारोगा और 9 सिपाहियों को घेरकर मार डाला। यहीं से हूल क्रांति की शुरुआत हुई।


छापामारी युद्ध लड़ने में निपुण थे संथाल विद्रोही

दिन प्रतिदिन संथाली सैनिकों की संख्या बढ़ती जा रही थी यह बढ़कर 30000 हो गई। समाज के सभी तबके का साथ मिलने के बाद वे बहुत मजबूत हो गए। तब यहां-वहां जमींदार और महाजन बड़ी संख्या में मारे जाने लगे। उनके डर से भागलपुर का मजिस्ट्रेट राजमहल भाग गया। सिद्धो-कान्हू-चांद-भैरव की सेना फिर बंगाल के मुर्शिदाबाद की ओर बढ़ने लगी। यहां 15 जुलाई 1855 को ब्रिटिश सेना के साथ लड़ाई में 200 से अधिक संथाली सैनिक शहीद हो गए। सिद्धो, कान्हू, भैरव भी बुरी तरह घायल हो गए। हालांकि, तब भी संथाल आंदोलन नहीं रुका। इसके बाद संथाल विद्रोही छापामारी युद्ध पद्धति से अंग्रेजाें पर हमला बोलने लगे। इसके बाद 10 नवंबर 1856 को अंग्रेजों ने संथाल के पूरे इलाके को सेना के सुपर्द कर दिया। तब इस इलाके में गांव के गांव जलाए जाने लगे। सिद्धो, कान्हू, चांद और भैरव को मार डाला गया। वे संथाल विद्रोह में शहीद हुए।

कहा जाता है कि इनकी दो बहनें फूलो और झानू भी हूल क्रांति में शामिल थी। अंग्रेजों के दमन से इनकी महान क्रांति का अंत हो गया, जिसमें हजारों संथालियों ने अपनी शहादत दी। हजारों संथाल हजारीबाग जेल में बंदी बनाकर रखे गए। संथाल विद्रोह का परिणाम यह हुआ कि बाद में यहां के लिए विशेष काश्तकारी अधिनियम लागू किया गया।

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