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दो जून की रोटी : कविता Do Joon Ki Roti Hindi Kavita

दो जून की रोटी : कविता


कविता

  दो जून की रोटी

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       संस्कृतियों की आन-बान-शान,
       अपनापन सा सिखलाती है।
       यह दो जून की रोटी सब्जी,
       हम सबकी भूख मिटाती है।।

       ऋषि मुनियों का देश हमारा,
       मानवता की पहरेदारी।
       यह दो जून की रोटी सब्जी,
       एक दूसरे की जिम्मेदारी।।

       जन्म-मरण तक का पावन बंधन,
       जैवविविधता का रखवाला।
       यह दो जून की सब्जी रोटी,
       मन से खाये,जो मतवाला।।

       रिश्तेदार, दोस्त,परिवार जन,
       मनभावन से तीज त्योहार।
       यह दो जून की रोटी सब्जी, 
       समय पर गाती मंगलाचार।।

       परमेश्वर से यही कामना
       हाथ जोड़ हमारी प्रार्थना।
       यह दो जून की रोटी सब्जी,
       जन जन को बराबर बाँटना।।
       ©️®️
       रामबाबू शर्मा,राजस्थानी,दौसा[राज.]


2 जुन भूख की रोटी


सुबह से शाम तक पसीना बहाया है,  
तब जाकर 2 जुन की रोटी पाई है।  
नहीं माँगी भीख किसी चौखट पर,  
मेहनत से अपनी किस्मत बनाई है।

कम का अपने उचित दाम लेना,  
सोच समझ कर हिम्मत से काम लेना।  
यदि बढ़ाया हूँ दो कदम अपने व्यापार में,  
तुम चार कदम बढ़ा कर मुझे थाम लेना।

धूप में तपकर जो आटा गूँधा है,  
उसमें दर्द का नमक भी मिलाया है।  
चूल्हे की आग से ज्यादा तो,  
जिम्मेदारी ने मुझे जलाया है।

बच्चों की थाली खाली न रहे,  
इसलिए खुद भूखा सो जाता हूँ।  
माँ-बाप की दुआ साथ रहे,  
इसी भरोसे रोज कमाता हूँ।

ऐ दुनिया वालों सुन लो तुम भी,  
एहसान नहीं चाहिए मुझको।  
बस मेरी मेहनत का मोल दे दो,  
और 2 जुन की रोटी इज्जत की दो।

साथ चलो तो मंज़िल आसान लगे,  
हाथ बढ़ाओ तो हौसला दोगुना लगे।  
मैं अकेला लड़ लूंगा भूख से,  
पर तुम थाम लो तो सफर सुहाना लगे।

 क्योंकि ये 2 जुन की रोटी सिर्फ पेट नहीं भरती,
 ये स्वाभिमान भी जिंदा रखती है।

अंतर्राष्ट्रीय
 हास्य कवि व्यंग्यकार
 अमन रंगेला 'अमन' सनातनी
 सावनेर नागपुर ( महाराष्ट्र)

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