मुझ पे मातम करो, लेकिन मुझे रुस्वा न करो!
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का शिकवा, अपने अज़ादारों से
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कल भी तन्हा था मैं, आज और भी तन्हा न करो!
मिरी ग़ुर्बत का ज़माने में तमाशा न करो!
तुम अज़ादार-ए-हुसैनؑ इब्न-ए-रसूलुल्लाह हो
अपनी अज़मत को किसी वक़्त घटाया न करो!
तुम अज़ादारी-ए-ज़ैनबؑ के मुहाफ़िज़ ठहरे
आक़ाज़ादी का भी पैग़ाम भुलाया न करो!
तुम ही दुनिया में हो तहज़ीब-ए-अज़ा के वारिस
अपनी मीरास को ऐसे ही लुटाया न करो!
शुक्रिया! ऐ मिरे ज़ख्मों पे तड़पने वालो!
अपने अश्कों को मगर लुक़्मा-ए-अअदा न करो!
मातमी जिस्म को देखे न कोई नामहरम
मुझ पे मातम करो, लेकिन मुझे रुस्वा न करो!
ख़ूँ बहाना है तो ज़ालिम के मुक़ाबिल निकलो!
अपने झगड़ों में ही यह ख़ून बहाया न करो!
तौक़ व ज़ंजीर कहाँ सुन्नत-ए-सज्जादؑ हुई
ज़ुल्म के गहने हैं ये, तुम इन्हें पहना न करो!
सुन्नत-ए-सैय्यद-ए-सज्जादؑ है सज्दे करना
तुम भी सज्दों से कभी सर को उठाया न करो!
याद है बरछी मगर भूले अज़ान-ए-अकबरؑ
जब अज़ाँ हो तो इबादात से भागा न करो!
मिरी मजलिस तो इबादत है, कोई रस्म नहीं
रस्म-ए-दुनिया की तरह इस को मनाया न करो!
मिरी मजलिस को बनाओ न तिजारत की जगह
मिरे ज़ाकिर हो तो इस ज़िक्र को बेचा न करो!
कोई आलिम हो तो मिम्बर की बनाओ ज़ीनत
किसी बूजहल को मिम्बर पे बिठाया न करो!
जिस को “हा” हू के अलावा नहीं आता कुछ भी
उस गुलूकार को मजलिस में बुलाया न करो!
जो न आयात व अहादीस पढ़ें मिम्बर से
ऐसे जाहिल ख़ुतबा को कभी चाहा न करो!
मेरा मक़सद, मेरा पैग़ाम सुनाए जो ख़तीब
उस की तक़रीर सुनो! फ़र्श से उठा न करो!
कोई आलिम हो, करो खूब सवालात मगर
उस को बेकार सवालों से सताया न करो!
मेरी मजलिस में कई हुर्रؑ भी चले आते हैं
तंज़ व नफ़रत के यहाँ तीर चलाया न करो!
वारिस-ए-चादर-ए-ज़ैनबؑ हैं ये माएँ, बहनें
बे-रिदा फ़र्श-ए-अज़ा पर इन्हें लाया न करो!
ये अज़ाख़ाने मेरा घर हैं, सो मेरे घर में
तुम नमाज़ों का तमस्ख़ुर तो उड़ाया न करो!
मुझ को जो ख़ालिक़-ए-अकबर के मुक़ाबिल ले आएँ
ऐसे मुशरिक ख़ुतबा को भी बुलाया न करो!
रोक दो अपनी मजलिसों को अज़ाँ होने पर
बे-अमल हो तो मजलिस में भी बैठा न करो!
काम जिस का हो फ़क़ीहों की एहानत करना
ऐसे फ़ासिक़ को महफ़िलों में बुलाया न करो!
जिन के मज़मून में शिर्क और ग़ुलू हो साक़िबؔ!
ऐसे अशआर मजलिसों में सुनाया न करो!
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अब्बास साक़िब


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